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Sunday, March 3, 2024

ऐतिहासिक चांदपुर गढ़ी एक बेहतरीन पर्यटन स्थल

चांदपुर गढ़ी किला उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है । चांदपुर गढ़ी किला कर्णप्रयाग और गैरसैंण के बीच स्थित है। अटागढ़ नदी के किनारे एक टीले पर स्थित चांदपुर गढ़ी किला, पंवार शासकों और गढ़वाल की कहानी कहता है। यह चांदपुर गढ़ी किला एक ऐतिहासिक पर्यटक आकर्षण है जो चमोली की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच स्थित है।

गढ़वाल के इतिहास की शुरुआत कत्यूरी राजाओं से मानी जाती है। कत्यूरी राजाओं ने 10वीं शताब्दी तक जोशीमठ में शासन किया और फिर 11वीं शताब्दी के आसपास अपनी राजधानी को अल्मोडा में स्थानांतरित कर दिया। जब कत्यूरी राजाओं ने गढ़वाल छोड़ कर अल्मोड़ा को अपनी राजधानी बनाया तो यहां कई छोटे-छोटे किले उभरे, जिनमें चांदपुर गढ़ी प्रमुख था।

चांदपुर गढ़ी को बहुत शक्तिशाली गढ़ माना गया है। यहां मिले प्राचीन अभिलेखों और पुरातत्व विभाग के साक्ष्यों से प्राप्त जानकारी के आधार पर कहा जाता है कि राजा कनक पाल , जो गढ़वाल के एक शक्तिशाली राजा थे, संवत में मालवा (जो आधुनिक मध्य प्रदेश में है) से गढ़वाल आए थे। 755 ई. में स्वयं को राजा सोनपाल का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। राजा कनकपाल ने चांदपुर गढ़ी को अपनी राजधानी के रूप में स्थापित किया।

चांदपुर गढ़ी के इतिहास को लेकर इतिहासकार एक मत नहीं हैं। इतिहासकार अभी तक यह स्पष्ट रूप से नहीं बता पाए हैं कि चांदपुर गढ़ी वास्तव में कब राजधानी बनी। कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है कि कनक पाल 699 में मालवा की धारा नगरी से यहाँ आये थे और कुछ का मानना ​​है कि वे गुर्जर देश (आधुनिक गुजरात) से आये थे।

चांदपुर गढ़ी किले का इतिहास करीब 1300 साल पुराना है। ऐसा माना जाता है कि 8वीं-9वीं शताब्दी में गढ़वाल क्षेत्र कई छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था। उसी समय चांदपुर गढ़ी में भानु प्रताप नामक शासक राज्य करता था। उन्होंने अपनी बेटी का विवाह कनक पाल नामक राजकुमार से तय किया, जो गुजरात के धारानगर से आया था और फिर चांदपुर का राज्य कनक पाल को दे दिया। इन्हीं कनक पाल ने गढ़वाल में पँवार वंश की स्थापना की। गढ़वाल का अर्थ है 52 किलों का समूह। उत्तराखंड में बावन किले हैं। उन्हीं किलों में से एक है चांदपुर गढ़ी किला।

पँवार वंश के अंतिम राजा राजा अजय पाल थे। 37वें राजा अजय पाल ने यहां के 52 गढ़ों को समेकित किया और बाद में इस क्षेत्र का नाम गढ़वाल रखा। यहीं से राजा अजय पाल ने गढ़वाल पर अपना शासन कार्य किया था। राजा अजय पाल ने बाद में अपनी राजधानी चांदपुर गढ़ी से बदलकर देवलगढ़ कर ली और उसके बाद राजधानी देवलगढ़ से बदलकर श्रीनगर कर दी गई, क्योंकि उस समय लगातार बाहरी हमले हो रहे थे, जिसके कारण राजा अजय पाल ने अपने राज्य को सुरक्षित रखने के लिए ऐसा निर्णय लिया। देवलगढ़ वर्तमान समय में पौडी जिले में स्थित है।

चांदपुर गढ़ी पूरा वीडियो यूट्यूब पर यहाँ देखें 👇👇👇

कृपया लिंक पर क्लिक करें👇👇👇

https://youtu.be/z74qZb_7JqU

Raj B Entertainment

Thursday, November 17, 2022

पलेठी सूर्य मंदिर की किसी को सुध नहीं ख़त्म हो रही है महान विरासत



सूर्य मंदिर का नाम सुनते ही हमारे सामने कोणार्क के सूर्य मंदिर की छवि बन जाती है, पर ऐसे ही दो सूर्य मंदिर और हैं जिनमे से एक कटारमल अल्मोड़ा में स्तिथ है तथा दूसरा पलेठी टिहरी गढ़वाल में।और मैं जिस सूर्य मंदिर के बारे में लिख रहा हूँ वो है टिहरी गढ़वाल की देवप्रयाग तहसील के ब्लॉक हिंडोलाखाल से 10 किलोमीटर की दूरी पर पलेठी गांव में स्तिथ ।



यह एक प्राचीन सूर्य मंदिर। मान्यता अनुसार 7वीं-8 वीं शताब्दी की प्राचीन अवधि से संबंधित गढ़वाल में हिंडोलाखाल से 10 किमी दूर यह सूर्य मंदिर, लुलेरा गुलेरा घाटी में स्थित हैं। अगर हम स्थानीय लोगों पर विश्वास करते हैं, तो ग्रामीणों द्वारा खुदाई में मंदिरों का एक समूह मिला था। जिनमे एक यह सूर्य मंदिर तथा एक शिव मंदिर प्राप्त हुए थे। भारत मे कोणार्क और कटारमल के अलावा तीसरा सूर्य मंदिर यंही स्तिथ है। इस सूर्य मंदिर के पत्थरों पर कौन सी लिपि में लिखा गया है ये आज भी एक चर्चा और खोज का विषय है। कुछ पत्थरों पर पाया गया है कि इनपर ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है पर कुछ पर अभी स्तिथि स्पष्ट नही है भारतीय पुरातत्व विभाग के डॉ एसएन घई और डॉ के.वी. रमेश, ने 22 अक्टूबर 1968 को मंदिर के शिलालेखों का अध्ययन किया। महाराजाधिरराज परमेश्वर कल्याण वर्मन का नाम ब्रह्मी में संरचना पर एक प्रमुख उल्लेख पाया गया है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, सूर्य मंदिर 7वीं -8वीं शताब्दी के दौरान बनाए गए थे जब यह क्षेत्र ब्रह्मपुर के वरमानों के शासनकाल में था। अपने आप मे कई अनोखे राज समेटे यह सूर्य मंदिर पर्यटन और आध्यात्मिक दृष्टि से कई बड़ी संभावनाएं समेटे हुए है। इस मंदिर का डिजाइन अपने आप मे अलग और दुर्लभ है। आद्यात्मिकता और पर्यटन को साथ संजोने की दृष्टि से ये भारत की कुछ चुनिन्दा जगहों में से एक है।





पलेठी में सूर्य मंदिर इस अर्थ में विशेष हैं कि ये दक्षिण भारतीय परंपरा से अलग है। इस सूर्य मंदिर के पास में एक और मंदिर स्तिथ है जो भगवान भोलेनाथ का मंदिर है जो श्री चमनेश्वर महादेव के नाम से विख्यात है। दोनों मंदिर संस्कृतिक विरासत को संभाले हुए है किंतु सरकार और सरकारी मशीनरी के ढीले रवैये के कारण ये आज जिस जर्जर स्तिथि में है उसे गांव ही नही अपितु पूरे क्षेत्र के लोगो मे निराशा की भावना है उचित रखरखाव की कमी के कारण यह सूर्य मंदिर विलुप्त होने के कगार पर है। प्राचीन संरचनाएं जिनमें पुरातात्विक महत्व है, वे उचित रखरखावों न होने के कारण बर्बाद हो रहे हैं। आज इस मंदिर के पास में सड़क पहुंच गई है जिससे यंहा पहुंचना बहुत आसान हो गया है और इसके पुनः जीर्णोद्धार के लिए ज्यादा मेहनत की भी जरूरत नही पड़ेगी पर कोई भी सरकार या जिला प्रशासन इसकी सुध नही लेता है। अगर प्रशासन और सरकार इसपर ध्यान देते हैं तो भविष्य में हमारी इस महान धरोहर को एक बडे पर्यटन क्षेत्र के रूप में देखा जा सकता है। बस जरूरत है एक पहल की।

#राजबिष्ट


Saturday, December 4, 2021

चमत्कारी संत श्री नीम करोली।

चमत्कारी संत श्री नीम करोली जी महाराज जी.

 भारतभूमि कई सिद्ध आत्माओं की जन्मभूमि रही है. इसे ऋषि मुनियों की कर्म भूमि होने का सौभाग्य प्राप्त रहा है. ऐसे ही एक महान संत हुए बाबा नीब करौरी महाराज जी, जिनकी दिव्यता के मुरीद भारतभूमि से लेकर पूरे विश्व के जनमानस रहे. एप्पल कंपनी के संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग, बाबा नीब करौरी महाराज को अपनी आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बताते हुए आए हैं.

नीब करौरी महाराज जी को उनके भक्त महाराज जी के नाम से संबोधित करते हैं. महाराज जी का जन्म सन 1900 में अकबरपुर गांव, फ़िरोज़ाबाद ज़िला, उत्तरप्रदेश  के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिताजी का नाम दुर्गा प्रसाद शर्मा था.परिवार वालों ने महाराज जी का नाम लक्ष्मण दास शर्मा रखा था.


ग्यारह वर्ष की आयु में बालक लक्ष्मण दास का विवाह करा दिया गया. लेकिन उनका मन गृहस्थ जीवन में नहीं लगा और उन्होंने गृह त्याग दिया. कुछ वक़्त साधु की तरह भटकने के बाद, पिता दुर्गा प्रसाद शर्मा की विनती पर लक्ष्मण दास घर लौट आए और सांसारिक जीवन जीने लगे.


मगर नियति में आध्यात्मिक संसार और जीवन लिखा था. सन 1958 में महाराज जी ने सांसारिक जीवन त्याग दिया.उन्होंने पूरे उत्तर भारत की यात्रा की। यहां एक रोचक प्रसंग मिलता है. जब महाराज जी अपने गांव से उत्तर भारत की यात्रा पर निकले तो टिकट कलेक्टर ने उन्हें फर्रुखाबाद जनपद के गांव नीब करौरी के निकट ट्रेन से उतार दिया. महाराज जी के पास ट्रेन का टिकट नहीं था। महाराज जी उतर गए. मगर फिर ट्रेन नहीं चल सकी. यात्रियों ने टीसी से कहा कि यह एक महान संत हैं और इनकी आज्ञा के बिना अब यह ट्रेन नहीं चलने वाली. टीसी ने तब महाराज जी से क्षमा याचना की और ट्रेन को चलने की आज्ञा देने की विनती की. इस पर महाराज जी ने दो शर्त रखी. पहली यह कि नीब करौरी को एक रेलवे स्टेशन घोषित किया जाए.और आगे से साधु महात्माओं से अच्छी तरह से पेश आया जाए. रेलवे अधिकारियों ने दोनों शर्त मान ली और फिर ट्रेन चल पड़ी. 



अपनी यात्राओं के दौरान महाराज जी अलग अलग स्थानों पर रुकते. उनके अलग अलग नाम रखे गए. भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार उनको पुकारता.महाराज जी प्रभु श्री राम और हनुमान जी की भक्ति करते थे. अपने भक्तो को हनुमान चालीसा पढ़ने की सलाह देते थे.गुजरात में तपस्या करने के बाद महाराज जी ने अपने दो आश्रम स्थापित किए. फर्रुखाबाद और कैंची में.यह दोनों आश्रम विदेशियों के आकर्षण का केंद्र बने.हिप्पी आंदोलन के दौरान जो विदेशी भारत भूमि अाए, वह महाराज जी के संपर्क में आने पर उनके अनन्य भक्त बन गए.राम दास, कृष्ण दास उनके विदेशी भक्तो के नाम थे, जिनका नामकरण महाराज जी ने स्वयं किया. 


महाराज जी ने सन 1964 में कैंची, उत्तराखंड में अपने आध्यात्मिक धाम की स्थापना की. अपने जीवन के अंतिम दस वर्ष महाराज जी कैंची धाम में रहे.कैंची धाम विश्व विख्यात स्थल है. यहां हर वर्ष 15 जून को विशाल भंडारा होता है, जहां एक दिन में तक़रीबन एक साल से अधिक लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं.


महाराज जी की कुछ बहुत साफ़, सीधी, सटीक बातें थीं. सभी से प्रेम करो, ईश्वर का स्मरण करो, भूखों को भोजन कराओ, सभी के साथ सेवा भाव रखो.


11 सितंबर 1973 को वृंदावन के एक अस्पताल में महाराज जी ने अपने भौतिक शरीर का त्याग कर दिया. वृंदावन में ही उनका समाधि स्थल है. आज महाराज जी के करोड़ों भक्त पूरी दुनिया में सेवा और प्रेम का संदेश दे रहे हैं. यही सच्ची प्रार्थना है.


#राज बिष्ट

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