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Saturday, November 19, 2022

इस गाँव जाने के बाद कभी नहीं आती गरीबी

 आपने दुनिया की कई अनोखी जगह के बारे में तो सुना होगा उन्हीं अनोखी जगह में से एक जगह है उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित माणा गांव । माणा गांव को भारत का अंतिम गांव भी कहा जाता है कहा जाता है कि जो भी यहां जाता है उसकी गरीबी हमेशा के लिए दूर हो जाती है और इसके पीछे की कई घटनाओं का जिक्र यहां पर किया जाता है  माना जाता है कि यह गांव शाप मुक्त है और भगवान शिव की यहां पर असीम कृपा सब पर बनी रहती है जो भी इस गांव में जाता है उस पर शिव की कृपा बनी रहती है और इस गांव में जाने से आदमी की दरिद्रता हमेशा के लिए दूर हो जाती है  यहां जाने से यह भी मान्यता है कि पाप मिट जाते हैं और भगवान शिव की कृपा उसको प्रदान होती है

 यह गांव प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ एक अनोखा गांव भी है

 माना जाता है कि कई वर्षों पूर्व भारत और तिब्बत के बीच व्यापार यहीं से होता था उसी में एक व्यापारी था जिसका नाम माणिक शाह था माणिक  एक दिन व्यापार करने के लिए तिब्बत जा रहा था तो रास्ते में कुछ लुटेरों ने उसे रोककर उसकी गर्दन काट दी गर्दन काटने  के बाद भी उसके मुंह से शिव के लिए ही प्रार्थना निकल रही थी यह देखकर भगवान शिव बहुत खुश हुए और उसे वराह का सिर लगाकर वहां पर जीवित कर दिया तब से वहां पर माणिक भद्र की पूजा की जाती है भगवान शिव ने माणिक भद्र को वरदान दिया कि जब भी कोई यहां पर आए  और पूजा करे तो तुम उनकी दरिद्रता दूर करोगे।

 एक और मान्यता के अनुसार यह भी माना जाता है कि  भगवान श्री गणेश के कहने पर वेदव्यास जी ने यहीं पर महाभारत की रचना की थी और महाभारत के युद्ध के समापन के बाद पांडव द्रोपदी समेत यही से स्वर्ग के लिए गए थे तो कहां जाता है कि यहीं से स्वर्ग की सीड़ियों का  प्रारंभ होता है

उत्तराखण्ड  को यूँ ही  नहीं देवों  कि भूमि कहा जाता है।

एक बार जरूर इस गांव  को जाएँ क्या पता वहां से आपकी किस्मत बदल जाये।


#राज् बिष्ट







Thursday, November 17, 2022

पलेठी सूर्य मंदिर की किसी को सुध नहीं ख़त्म हो रही है महान विरासत



सूर्य मंदिर का नाम सुनते ही हमारे सामने कोणार्क के सूर्य मंदिर की छवि बन जाती है, पर ऐसे ही दो सूर्य मंदिर और हैं जिनमे से एक कटारमल अल्मोड़ा में स्तिथ है तथा दूसरा पलेठी टिहरी गढ़वाल में।और मैं जिस सूर्य मंदिर के बारे में लिख रहा हूँ वो है टिहरी गढ़वाल की देवप्रयाग तहसील के ब्लॉक हिंडोलाखाल से 10 किलोमीटर की दूरी पर पलेठी गांव में स्तिथ ।



यह एक प्राचीन सूर्य मंदिर। मान्यता अनुसार 7वीं-8 वीं शताब्दी की प्राचीन अवधि से संबंधित गढ़वाल में हिंडोलाखाल से 10 किमी दूर यह सूर्य मंदिर, लुलेरा गुलेरा घाटी में स्थित हैं। अगर हम स्थानीय लोगों पर विश्वास करते हैं, तो ग्रामीणों द्वारा खुदाई में मंदिरों का एक समूह मिला था। जिनमे एक यह सूर्य मंदिर तथा एक शिव मंदिर प्राप्त हुए थे। भारत मे कोणार्क और कटारमल के अलावा तीसरा सूर्य मंदिर यंही स्तिथ है। इस सूर्य मंदिर के पत्थरों पर कौन सी लिपि में लिखा गया है ये आज भी एक चर्चा और खोज का विषय है। कुछ पत्थरों पर पाया गया है कि इनपर ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है पर कुछ पर अभी स्तिथि स्पष्ट नही है भारतीय पुरातत्व विभाग के डॉ एसएन घई और डॉ के.वी. रमेश, ने 22 अक्टूबर 1968 को मंदिर के शिलालेखों का अध्ययन किया। महाराजाधिरराज परमेश्वर कल्याण वर्मन का नाम ब्रह्मी में संरचना पर एक प्रमुख उल्लेख पाया गया है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, सूर्य मंदिर 7वीं -8वीं शताब्दी के दौरान बनाए गए थे जब यह क्षेत्र ब्रह्मपुर के वरमानों के शासनकाल में था। अपने आप मे कई अनोखे राज समेटे यह सूर्य मंदिर पर्यटन और आध्यात्मिक दृष्टि से कई बड़ी संभावनाएं समेटे हुए है। इस मंदिर का डिजाइन अपने आप मे अलग और दुर्लभ है। आद्यात्मिकता और पर्यटन को साथ संजोने की दृष्टि से ये भारत की कुछ चुनिन्दा जगहों में से एक है।





पलेठी में सूर्य मंदिर इस अर्थ में विशेष हैं कि ये दक्षिण भारतीय परंपरा से अलग है। इस सूर्य मंदिर के पास में एक और मंदिर स्तिथ है जो भगवान भोलेनाथ का मंदिर है जो श्री चमनेश्वर महादेव के नाम से विख्यात है। दोनों मंदिर संस्कृतिक विरासत को संभाले हुए है किंतु सरकार और सरकारी मशीनरी के ढीले रवैये के कारण ये आज जिस जर्जर स्तिथि में है उसे गांव ही नही अपितु पूरे क्षेत्र के लोगो मे निराशा की भावना है उचित रखरखाव की कमी के कारण यह सूर्य मंदिर विलुप्त होने के कगार पर है। प्राचीन संरचनाएं जिनमें पुरातात्विक महत्व है, वे उचित रखरखावों न होने के कारण बर्बाद हो रहे हैं। आज इस मंदिर के पास में सड़क पहुंच गई है जिससे यंहा पहुंचना बहुत आसान हो गया है और इसके पुनः जीर्णोद्धार के लिए ज्यादा मेहनत की भी जरूरत नही पड़ेगी पर कोई भी सरकार या जिला प्रशासन इसकी सुध नही लेता है। अगर प्रशासन और सरकार इसपर ध्यान देते हैं तो भविष्य में हमारी इस महान धरोहर को एक बडे पर्यटन क्षेत्र के रूप में देखा जा सकता है। बस जरूरत है एक पहल की।

#राजबिष्ट


Friday, August 5, 2022

क्या यही है सपनो का भारत

 भारत सदियों से एक ऐसा देश रहा हैं जहाँ हर प्रकार के लोगो को समाहित करने का माद्दा है



भारत ने न कभी किसी देश पर इस उद्देश्य से आक्रमण किया की उसकी जमीन पर कब्ज़ा किया जाए और न कभी इस उद्देश्य से की किसी देश को आगे बढ़ने से रोका जाए भारत ने हमेशा से ही वसुधैव कुटुंबकम की अपनी नीति को अपनाया है और हमेशा ही उसपर कायम रहा है इतिहस गवाह है की जिसने भी यहाँ आकर यहाँ के रीति रिवाजो और यहाँ की संस्कृति को मिटाना चाहा या तो वो खुद मिट गया या फिर यहीं की संस्कृति में रम गया

भारत एक समागम का देश है जो ठीक उस फूलों के गुच्छे की तरह है जो कई तरह के फूलों को खुद में  समाये हुए है 

अपनी भिन्नताओ और अनेकता में एकता के लिए ही भारत को जाना जाता है 

 पर आज ऐसा दौर आ गया है जब हमने अपने सब नैतिक मूल्यों को खो दिया है हम इतने स्वार्थी हो गए हैं की जो हमारे स्वार्थ का कार्य न हो उसे करने के लिए हजार बार सोचते हैं चाहे वो कार्य कितना ही देशहित में  महत्वपूर्ण और आवशयक  क्यों न हो 

स्वच्छता  और समानता  का जो भाव हमारे  दिलो में होता था वो कहीं खो सा गया है एक दूसरे से निस्वार्थ मिलने की भावना कहीं बिखर के रह गयी है 

आज हम अपने आजादी के महान शहीदों को  सिर्फ स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर याद करते हैं उनकी कुर्बानियों  को भूल गये हैं 

हमने अपने सभी नैतिक मूल्यों का त्याग कर दिया है 

भारत को विकसित और संपन्न सिर्फ आर्थिक रूप से बनाना ही नहीं बल्कि उसकी जो सामाजिक समरसता है उससे भी बरकार रखना है 

जब हम अपने नैतिक मूल्यों को सही से समझ पाएंगे तब जाके ही कहीं एक समृद्ध विकसित सपनो के भारत का निर्माण हो पायेगा 

आपके कुछ विचार हों तो  कमेंट में जरूर लिखें 

राज बिष्ट  

Saturday, December 4, 2021

चमत्कारी संत श्री नीम करोली।

चमत्कारी संत श्री नीम करोली जी महाराज जी.

 भारतभूमि कई सिद्ध आत्माओं की जन्मभूमि रही है. इसे ऋषि मुनियों की कर्म भूमि होने का सौभाग्य प्राप्त रहा है. ऐसे ही एक महान संत हुए बाबा नीब करौरी महाराज जी, जिनकी दिव्यता के मुरीद भारतभूमि से लेकर पूरे विश्व के जनमानस रहे. एप्पल कंपनी के संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग, बाबा नीब करौरी महाराज को अपनी आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बताते हुए आए हैं.

नीब करौरी महाराज जी को उनके भक्त महाराज जी के नाम से संबोधित करते हैं. महाराज जी का जन्म सन 1900 में अकबरपुर गांव, फ़िरोज़ाबाद ज़िला, उत्तरप्रदेश  के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिताजी का नाम दुर्गा प्रसाद शर्मा था.परिवार वालों ने महाराज जी का नाम लक्ष्मण दास शर्मा रखा था.


ग्यारह वर्ष की आयु में बालक लक्ष्मण दास का विवाह करा दिया गया. लेकिन उनका मन गृहस्थ जीवन में नहीं लगा और उन्होंने गृह त्याग दिया. कुछ वक़्त साधु की तरह भटकने के बाद, पिता दुर्गा प्रसाद शर्मा की विनती पर लक्ष्मण दास घर लौट आए और सांसारिक जीवन जीने लगे.


मगर नियति में आध्यात्मिक संसार और जीवन लिखा था. सन 1958 में महाराज जी ने सांसारिक जीवन त्याग दिया.उन्होंने पूरे उत्तर भारत की यात्रा की। यहां एक रोचक प्रसंग मिलता है. जब महाराज जी अपने गांव से उत्तर भारत की यात्रा पर निकले तो टिकट कलेक्टर ने उन्हें फर्रुखाबाद जनपद के गांव नीब करौरी के निकट ट्रेन से उतार दिया. महाराज जी के पास ट्रेन का टिकट नहीं था। महाराज जी उतर गए. मगर फिर ट्रेन नहीं चल सकी. यात्रियों ने टीसी से कहा कि यह एक महान संत हैं और इनकी आज्ञा के बिना अब यह ट्रेन नहीं चलने वाली. टीसी ने तब महाराज जी से क्षमा याचना की और ट्रेन को चलने की आज्ञा देने की विनती की. इस पर महाराज जी ने दो शर्त रखी. पहली यह कि नीब करौरी को एक रेलवे स्टेशन घोषित किया जाए.और आगे से साधु महात्माओं से अच्छी तरह से पेश आया जाए. रेलवे अधिकारियों ने दोनों शर्त मान ली और फिर ट्रेन चल पड़ी. 



अपनी यात्राओं के दौरान महाराज जी अलग अलग स्थानों पर रुकते. उनके अलग अलग नाम रखे गए. भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार उनको पुकारता.महाराज जी प्रभु श्री राम और हनुमान जी की भक्ति करते थे. अपने भक्तो को हनुमान चालीसा पढ़ने की सलाह देते थे.गुजरात में तपस्या करने के बाद महाराज जी ने अपने दो आश्रम स्थापित किए. फर्रुखाबाद और कैंची में.यह दोनों आश्रम विदेशियों के आकर्षण का केंद्र बने.हिप्पी आंदोलन के दौरान जो विदेशी भारत भूमि अाए, वह महाराज जी के संपर्क में आने पर उनके अनन्य भक्त बन गए.राम दास, कृष्ण दास उनके विदेशी भक्तो के नाम थे, जिनका नामकरण महाराज जी ने स्वयं किया. 


महाराज जी ने सन 1964 में कैंची, उत्तराखंड में अपने आध्यात्मिक धाम की स्थापना की. अपने जीवन के अंतिम दस वर्ष महाराज जी कैंची धाम में रहे.कैंची धाम विश्व विख्यात स्थल है. यहां हर वर्ष 15 जून को विशाल भंडारा होता है, जहां एक दिन में तक़रीबन एक साल से अधिक लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं.


महाराज जी की कुछ बहुत साफ़, सीधी, सटीक बातें थीं. सभी से प्रेम करो, ईश्वर का स्मरण करो, भूखों को भोजन कराओ, सभी के साथ सेवा भाव रखो.


11 सितंबर 1973 को वृंदावन के एक अस्पताल में महाराज जी ने अपने भौतिक शरीर का त्याग कर दिया. वृंदावन में ही उनका समाधि स्थल है. आज महाराज जी के करोड़ों भक्त पूरी दुनिया में सेवा और प्रेम का संदेश दे रहे हैं. यही सच्ची प्रार्थना है.


#राज बिष्ट

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