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Tuesday, July 8, 2025

खासपट्टी वीरों की भूमी, वीरगाथा।

खासपट्टी नाम से ही खास (Special)

उत्तराखंड की पावन धरती पर स्थित खासपट्टी न सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है, बल्कि यह क्षेत्र वीरता, शौर्य और बलिदान की अमिट कहानियों का भी साक्षी रहा है। खासपट्टी की भूमि को 'वीरों की धरती' कहा जाना केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि यहां की ऐतिहासिक और सामाजिक विरासत का सजीव प्रमाण है। यहां के लोग अपने साहस, राष्ट्रभक्ति और आत्मबलिदान के लिए जाने जाते हैं, जिन्होंने देश की रक्षा और समाज के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।



इतिहास की गहराइयों में खासपट्टी

खासपट्टी क्षेत्र सदियों से वीरता और बलिदान की भूमि रही है। अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम हो या चीन और पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध – यहां के सपूतों ने हर मोर्चे पर दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया। विशेष रूप से द्वितीय विश्वयुद्ध, 1962 का भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 और 1999 के कारगिल के भारत-पाक युद्धों में खासपट्टी के वीर सैनिकों ने शौर्य का अद्वितीय प्रदर्शन किया। कई जवानों ने अपने प्राणों की आहुति देकर मातृभूमि की लाज रखी।


वीरों की अमर गाथाएं

खासपट्टी के हर गांव की मिट्टी में एक कहानी दबी हुई है — किसी शहीद बेटे की, किसी वीर पिता की, किसी मां की आंखों में छिपे गर्व की। इस क्षेत्र से अनेक युवा सेना, अर्धसैनिक बल और पुलिस बल में सेवा दे चुके हैं और दे रहे हैं। यह क्षेत्र न केवल शारीरिक रूप से मजबूत सैनिकों को जन्म देता है, बल्कि मानसिक रूप से भी साहसी और अनुशासित नागरिकों को तैयार करता है।

खासपट्टी के शहीद वीरों की गाथा , जो देश की रक्षा के लिए लड़ते हुए युद्ध में शहीद हुए, उनकी गाथा आज भी खासपट्टी में गर्व के साथ सुनाई जाती है। उनकी वीरता और बलिदान से प्रेरित होकर आज भी कई युवा सेना में भर्ती होकर देश सेवा की भावना को आगे बढ़ा रहे हैं।


वीर नारियों का योगदान

खासपट्टी की वीरता की गाथा केवल पुरुषों तक सीमित नहीं है। यहां की महिलाएं भी साहस, धैर्य और देशभक्ति की मिसाल हैं। जब पुरुष मोर्चे पर थे, तब इन महिलाओं ने खेत-खलिहान से लेकर घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाई और बच्चों में देशभक्ति की भावना रोपी। आज भी यहां की बेटियां शिक्षा, खेल और प्रशासनिक सेवाओं में आगे बढ़ रही हैं, जिससे यह भूमि गौरवांवित हो रही है।


संस्कृति और परंपरा में वीरता की झलक

खासपट्टी की लोक संस्कृति, थाैल- मेला, लोक गीत, झोड़ा-चांचरी और पंवाड़ों में वीरता के गीत गाए जाते हैं। पंवाड़ – उत्तराखंड का लोक गायन, जिसमें वीर शहीदों और योद्धाओं की गाथाएं गाई जाती हैं, आज भी खासपट्टी की रातों को गर्व से भर देता है। 'नर भुजबल का रूप है, वीरों की ये जाति है' जैसी पंक्तियां हर बच्चे के हृदय में गूंजती हैं।


आज की पीढ़ी में भी वही जोश

आज भी खासपट्टी के युवा सेना में भर्ती के लिए कठिन प्रशिक्षण लेते हैं, पर्वतीय भूभाग में दौड़ लगाते हैं और बचपन से ही अनुशासन व देशप्रेम की भावना के साथ बड़े होते हैं। हर घर से एक फौजी देने की परंपरा को यहां के लोग गर्व से निभाते हैं।

यहां कई युवक सेना, ITBP, BSF, CRPF जैसी सेवाओं में कार्यरत हैं। सिर्फ पुरुष ही नहीं, आज की बेटियां भी वायुसेना, पुलिस व सिविल सेवाओं में नाम रोशन कर रही हैं। यह प्रमाण है कि खासपट्टी की वीरता आज भी जिंदा है और और भी मजबूत होती जा रही है।

होटल में भी विदेशों में ख़ासपट्टी करवाती है गौरवान्वित

विदेश में खास पट्टी के बहुत सारे लोग होटल में शेफ बनकर लोगों को शानदार खाने का जायका देते हैं ऐसा स्वादिष्ट और जायकेदार  खाना बनाते हैं जिसने पूरे खास पट्टी को विश्व में प्रसिद्ध कर दिया है खास पट्टी के लोग लग्नशील और मेहनती होते हैं उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर भारत ही नहीं विदेश में भी होटल लाइन को एक नई पहचान दी है और उत्तराखंड की इकोनॉमी को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है होटल लाइन एक ऐसी लाइन है जिसे निम्नतम समझा जाता था किंतु खास पट्टी के लोगों इसे अलग पहचान देकर देश ही नहीं विदेशो में भी अपने नाम का डंका बजाया है और अलग पहचान बनाकर होटल लाइन को भी खासपट्टी की तरह खास कर दिया।

समाज में सेवा भाव

वीरता केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहती। खासपट्टी के लोग सामाजिक जिम्मेदारियों में भी अग्रणी हैं। चाहे आपदा राहत हो, गाँव में विकास कार्य हों, या शिक्षा के प्रचार-प्रसार की बात — यहां के लोग स्वेच्छा से आगे आते हैं। 'सेवा ही धर्म है' की भावना यहां के लोगों के हृदय में बसी है।


सरकार और समाज की जिम्मेदारी

ऐसी वीर भूमि को और भी प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। शहीदों की स्मृतियों को संरक्षित करना, वीर परिवारों को सम्मान देना, युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर देना और क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार व समाज दोनों की जिम्मेदारी है।

#RajBisht 

स्वास्थ और शिक्षा के साथ साथ यहां के युवाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करने की जिम्मेदारी भी समाज और सरकार दोनों की है

निष्कर्ष

खासपट्टी केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि वह पावन भूमि है जो सच्चे देशभक्तों को जन्म देती है। इसकी मिट्टी में बलिदान की खुशबू, इसके जल में वीरता की धार और इसकी हवाओं में आत्मगौरव की गूंज है। यह भूमि हमें प्रेरणा देती है कि हम भी अपने जीवन में कुछ ऐसा करें कि आने वाली पीढ़ियां हम पर गर्व करें।

खासपट्टी की वीरता को मेरा शत-शत नमन। जय हिंद। 🇮🇳


Sunday, August 11, 2024

अमर बलिदानी खुदीराम बोस 11 अगस्त।

11 अगस्त अमर बलिदानी खुदीराम बोस

भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में अनेक कम आयु के वीरों ने भी अपने प्राणों की आहुति दी है। उनमें खुदीराम बोस का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है। उन दिनों अनेक अंग्रेज अधिकारी भारतीयों से बहुत दुर्व्यवहार करते थे। ऐसा ही एक मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड उन दिनों मुज्जफरपुर, बिहार में तैनात था।  वह छोटी-छोटी बात पर भारतीयों को कड़ी सजा देता था। अतः क्रान्तिकारियों ने उससे बदला लेने का निश्चय किया।

कोलकाता में प्रमुख क्रान्तिकारियों की एक बैठक में किंग्सफोर्ड को यमलोक पहुँचाने की योजना पर गहन विचार हुआ। उस बैठक में खुदीराम बोस भी उपस्थित थे। यद्यपि उनकी अवस्था बहुत कम थी; फिर भी उन्होंने स्वयं को इस खतरनाक कार्य के लिए प्रस्तुत किया। उनके साथ प्रफुल्ल कुमार चाकी को भी इस अभियान को पूरा करने का दायित्व दिया गया।

योजना का निश्चय हो जाने के बाद दोनों युवकों को एक बम, तीन पिस्तौल तथा 40 कारतूस दे दिये गये। दोनों ने मुज्जफरपुर पहुँचकर एक धर्मशाला में डेरा जमा लिया। कुछ दिन तक दोनों ने किंग्सफोर्ड की गतिविधियों का अध्ययन किया। इससे उन्हें पता लग गया कि वह किस समय न्यायालय आता-जाता है; पर उस समय उसके साथ बड़ी संख्या में पुलिस बल रहता था। अतः उस समय उसे मारना कठिन था।

अब उन्होंने उसकी शेष दिनचर्या पर ध्यान दिया। किंग्सफोर्ड प्रतिदिन शाम को लाल रंग की बग्घी में क्लब जाता था। दोनों ने इस समय ही उसके वध का निश्चय किया। 30 अपै्रल, 1908 को दोनों क्लब के पास की झाड़ियों में छिप गये। शराब और नाच-गान समाप्त कर लोग वापस जाने लगे। अचानक एक लाल बग्घी क्लब से निकली। खुदीराम और प्रफुल्ल की आँखें चमक उठीं। वे पीछे से बग्घी पर चढ़ गये और परदा हटाकर बम दाग दिया। इसके बाद दोनों फरार हो गये।


परन्तु दुर्भाग्य की बात कि किंग्सफोर्ड उस दिन क्लब आया ही नहीं था। उसके जैसी ही लाल बग्घी में दो अंग्रेज महिलाएँ वापस घर जा रही थीं। क्रान्तिकारियों के हमले से वे ही यमलोक पहुँच गयीं। पुलिस ने चारों ओर जाल बिछा दिया। बग्घी के चालक ने दो युवकों की बात पुलिस को बतायी। खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी सारी रात भागते रहे। भूख-प्यास के मारे दोनों का बुरा हाल था। वे किसी भी तरह सुरक्षित कोलकाता पहुँचना चाहते थे।

प्रफुल्ल लगातार 24 घण्टे भागकर समस्तीपुर पहुँचे और कोलकाता की रेल में बैठ गये। उस डिब्बे में एक पुलिस अधिकारी भी था। प्रफुल्ल की अस्त व्यस्त स्थिति देखकर उसे संदेह हो गया। मोकामा पुलिस स्टेशन पर उसने प्रफुल्ल को पकड़ना चाहा; पर उसके हाथ आने से पहले ही प्रफुल्ल ने पिस्तौल से स्वयं पर ही गोली चला दी और बलिपथ पर बढ़ गये।

इधर खुदीराम थक कर एक दुकान पर कुछ खाने के लिए बैठ गये। वहाँ लोग रात वाली घटना की चर्चा कर रहे थे कि वहाँ दो महिलाएँ मारी गयीं। यह सुनकर खुदीराम के मुँह से निकला - तो क्या किंग्सफोर्ड बच गया ? यह सुनकर लोगों को सन्देह हो गया और उन्होंने उसे पकड़कर पुलिस को सौंप दिया। मुकदमे में खुदीराम को फाँसी की सजा घोषित की गयी। 11 अगस्त, 1908 को हाथ में गीता लेकर खुदीराम हँसते-हँसते फाँसी पर झूल गये। तब उनकी आयु 18 साल 8 महीने और 8 दिन थी। जहां वे पकड़े गये, उस पूसा रोड स्टेशन का नाम अब खुदीराम के नाम पर रखा गया है।

Saturday, April 20, 2024

चंद्रबदनी मंदिर: हिमालय में एक पवित्र स्वर्ग। Chandrabadni Mandir Himalaya Me Ek Swarg.

चंद्रबदनी मंदिर: हिमालय में एक पवित्र स्वर्ग

भारत के उत्तराखंड के राजसी गढ़वाल हिमालय के बीच , शांत और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण चंद्रबदनी मंदिर स्थित है। समुद्र तल से 2,277 मीटर (7,470 फीट) की ऊंचाई पर स्थित, यह प्राचीन मंदिर भक्तों और यात्रियों के लिए अत्यधिक धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। देवप्रयाग से मात्र 33 किमी की दूरी पर स्थित है माता का यह भव्य मंदिर। यहाँ आने के लिए आपको देवप्रयाग से हिण्डोलाखाल से होते हुए जामणीखाल और  जामणीखाल से नैखरी के रास्ते माता के मदिर तक पहुंचना होता है।

                           चंद्रबदनी मंदिर: हिमालय में एक पवित्र स्वर्ग



मंदिर से 1 किमी पहले तक आप गाडी से सफर तय कर सकते हैं उसके बाद का 1 किमी का मार्ग आपको पैदल हीं तय करना होता है जो की खूबसूरत बांज और बुरांश के पेड़ो के बीच चिड़ियों की चहचाहट और मंत्रमुग्ध कर देने वाली खुशबु और ताजी हवा के बीच से होकर गुजरता है। 

चंद्रबदनी मंदिर: हिमालय में एक पवित्र स्वर्ग

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 

चंद्रबदनी मंदिर देवी पार्वती के अवतार देवी सती को समर्पित है। किंवदंती है कि सती की मृत्यु के बाद, भगवान शिव ने विनाश के अपने तांडव नृत्य में उनके जले हुए शरीर को पूरे ब्रह्मांड में ले गए। उन्हें शांत करने के लिए, भगवान विष्णु ने सती के शरीर को खंडित करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल किया और उनके शरीर के हिस्से विभिन्न स्थानों पर गिरे, जो अब शक्तिपीठों के रूप में प्रतिष्ठित हैं। माना जाता है कि चंद्रबदनी वह स्थान है जहां सती का धड़ गिरा था, जिससे यह अत्यधिक धार्मिक महत्व का स्थान बन गया।

चंद्रबदनी मंदिर: हिमालय में एक पवित्र स्वर्ग

धार्मिक महत्व: 

मंदिर पूरे वर्ष तीर्थयात्रियों और भक्तों को आकर्षित करता है, खासकर नवरात्रि त्योहार के दौरान जब विशेष प्रार्थना और अनुष्ठान बड़े उत्साह के साथ आयोजित किए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि नवरात्रि के दौरान चंद्रबदनी मंदिर के दर्शन करने से आशीर्वाद मिलता है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं। हिमालय पर्वतमाला के मनोरम दृश्यों से घिरा पवित्र वातावरण, आध्यात्मिक अनुभव को बढ़ाता है, जिससे यह भक्ति और प्राकृतिक सुंदरता दोनों का तीर्थ बन जाता है।

चंद्रबदनी मंदिर: हिमालय में एक पवित्र स्वर्ग

वास्तुकला का चमत्कार: 

चंद्रबदनी मंदिर की वास्तुकला सरल लेकिन सुरुचिपूर्ण है, जो मंदिर निर्माण की पारंपरिक गढ़वाली शैली को दर्शाती है। यह मंदिर जटिल नक्काशी और मूर्तियों से सुसज्जित है, जिसमें विभिन्न पौराणिक कहानियों और दैवीय ऊर्जा के प्रतीकों को दर्शाया गया है। गर्भगृह में देवी चंद्रबदनी की मूर्ति है, जो आभूषणों और फूलों से सुसज्जित है, जिससे दिव्य कृपा और शांति की आभा झलकती है।

चंद्रबदनी मंदिर: हिमालय में एक पवित्र स्वर्ग

प्राकृतिक सौंदर्य और ट्रैकिंग ट्रेल्स: 

अपने धार्मिक महत्व के अलावा, चंद्रबदनी हिमालय की चोटियों और हरी-भरी घाटियों के लुभावने दृश्य भी प्रदान करता है। मंदिर तक की यात्रा अपने आप में एक साहसिक कार्य है, जिसमें घने जंगलों, खिले हुए रोडोडेंड्रोन पेड़ों और कल-कल करती जलधाराओं के बीच ट्रैकिंग के रास्ते शामिल हैं। हालांकि यह ट्रेक थोड़ा चुनौतीपूर्ण है, लेकिन मंदिर परिसर तक पहुंचने पर यात्रियों को बेजोड़ प्राकृतिक सुंदरता और उपलब्धि की भावना मिलती है।

चंद्रबदनी मंदिर: हिमालय में एक पवित्र स्वर्ग

सांस्कृतिक विरासत और त्यौहार: 

चंद्रबदनी मंदिर के आसपास का क्षेत्र गढ़वाली और कुमाऊंनी परंपराओं के मिश्रण के साथ सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध है। स्थानीय त्यौहार, लोक संगीत और नृत्य प्रदर्शन आध्यात्मिक माहौल में जीवंतता जोड़ते हैं, जिससे आगंतुकों को उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक टेपेस्ट्री की झलक मिलती है। मंदिर सामुदायिक समारोहों और समारोहों के केंद्र बिंदु के रूप में कार्य करता है, जिससे भक्तों के बीच एकता और श्रद्धा की भावना को बढ़ावा मिलता है।

चंद्रबदनी मंदिर: हिमालय में एक पवित्र स्वर्ग

संरक्षण एवं संरक्षण के प्रयास: 

चन्द्रबदनी एवं इसके आसपास के क्षेत्रों के पारिस्थितिक संतुलन एवं सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के प्रयास जारी हैं। इस पवित्र स्थल के दीर्घकालिक संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए सतत पर्यटन प्रथाओं, अपशिष्ट प्रबंधन पहल और वनीकरण अभियान को लागू किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, स्थानीय समुदाय मंदिर परिसर की स्वच्छता और पवित्रता बनाए रखने में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं, जिससे भावी पीढ़ियों के लिए इसकी स्थिरता में योगदान होता है।

चंद्रबदनी मंदिर: हिमालय में एक पवित्र स्वर्ग

दर्शन और दिव्यता

चंद्रबदनी मंदिर सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं है बल्कि आध्यात्मिकता, प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत का अभयारण्य है। इसका कालातीत आकर्षण तीर्थयात्रियों और यात्रियों के दिलों को मोहित करता रहता है, और उन्हें हिमालय के शांत आलिंगन के बीच भक्ति और खोज की परिवर्तनकारी यात्रा पर आमंत्रित करता है।

अगर भी आज तक इस मंदिर मे नाही गये तो अवश्य दर्शन करने जाएं और अगर आपके जानने मे कोई नही गया है तो उन्हे इस मंदिर के बारे मे जरूर बताएं। आप चाहे तो उन्हे ये आर्टिकल भी भेज सकते हैं।

माता के दर्शन कीजिये और खूबसूरत वादियों का आनंद उठाएं।

माता रानी की कृपा आप पर सदैव बनी रहे। जय मां चंद्रबदनी।

#राजबिष्ट।

चंद्रबदनी मंदिर: हिमालय में एक पवित्र स्वर्ग

Monday, April 1, 2024

हिंदू नववर्ष 2024 कब मनेगा? हिंदू नववर्ष 2024

हिंदू नववर्ष 2024 कब मनेगा? हिंदू नववर्ष 2024

 हिंदू नववर्ष 2024 कब मनेगा? हिंदू नववर्ष 2024

हिंदू नववर्ष 2024: नई शुरुआत का जश्न

हिंदू नववर्ष, जिसे हिंदू नव वर्ष के रूप में भी जाना जाता है, हिंदू परंपरा में एक नए चंद्र कैलेंडर वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। भारत और उसके बाहर के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाने वाला यह शुभ अवसर जीवन के नवीनीकरण, अंधकार पर प्रकाश की विजय और नई आकांक्षाओं और प्रयासों की शुरुआत का प्रतीक है।

हिन्दु नववर्ष 2024 मे  शक संवत 2081 का प्रारंभ 09 अप्रैल से हो रहा है. इसका ब्रह्मा जी और सम्राट विक्रमादित्य के साथ गहरा कनेक्शन है.  यह संबंध. हिंदू नव वर्ष 2081: हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अर्थात 09 अप्रैल 2024 दिन मंगलवार से नववर्ष संवत 2081 शुरु हो जाएगा

हिंदू कैलेंडर सांस्कृतिक, धार्मिक और खगोलीय महत्व का एक समृद्ध टेपेस्ट्री है, जो सहस्राब्दियों से जटिल रूप से बुना गया है। यह चंद्र-सौर प्रणाली का अनुसरण करता है, जहां महीनों की गणना चंद्रमा के चरणों के आधार पर की जाती है और वर्षों को सूर्य और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर मापा जाता है। हिंदू नववर्ष आम तौर पर चैत्र (मार्च-अप्रैल) के महीने में पड़ता है, जो वसंत की शुरुआत का प्रतीक है, जो कायाकल्प और जीवन शक्ति का प्रतीक है।

हिंदू नववर्ष से जुड़े उत्सव क्षेत्र-दर-क्षेत्र अलग-अलग होते हैं, जो भारतीय संस्कृति की विविधता और जीवंतता को दर्शाते हैं। उत्तर भारत में, इस अवसर को चैत्र नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है, जो देवी दुर्गा और उनके विभिन्न अवतारों की पूजा के लिए समर्पित नौ दिवसीय त्योहार है। भक्त उपवास रखते हैं, प्रार्थना करते हैं, और खुशी और भक्ति का संचार करते हुए रंगारंग जुलूसों और सांस्कृतिक प्रदर्शनों में भाग लेते हैं।

महाराष्ट्र में, त्योहार को गुड़ी पड़वा के नाम से जाना जाता है, जहां परिवार जीत और समृद्धि के प्रतीक के रूप में अपने घरों के बाहर गुड़ी (चमकीले सजे हुए खंभे) फहराते हैं। पारंपरिक अनुष्ठान, जैसे नीम के पत्ते तोड़ना और मिठाइयाँ बाँटना, बुराई को दूर करने और शुभता लाने के लिए मनाए जाते हैं।

इसी तरह, दक्षिण भारत में, हिंदू नववर्ष को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में उगादी, कर्नाटक में युगादी और केरल में विशु के रूप में मनाया जाता है। प्रत्येक क्षेत्र उत्सव में अपना अनूठा स्वाद जोड़ता है, विशेष व्यंजनों की तैयारी, उपहारों का आदान-प्रदान और आने वाले वर्ष की भविष्यवाणी करने के लिए पंचांग (पंचांग) पढ़ने जैसे अनुष्ठानों के साथ।

हिंदू नववर्ष केवल मौज-मस्ती का समय नहीं है; यह चिंतन और आत्मनिरीक्षण का भी समय है। यह व्यक्तियों को पिछले वर्ष के सबक पर विचार करने और आने वाले वर्ष के लिए इरादे निर्धारित करने के लिए प्रोत्साहित करता है। बहुत से लोग समृद्ध भविष्य के लिए मार्गदर्शन और आशीर्वाद पाने के लिए आध्यात्मिक यात्राएं करते हैं, दान के कार्यों में संलग्न होते हैं, या श्रद्धेय संतों और संतों से आशीर्वाद लेते हैं।

इसके अलावा, हिंदू नववर्ष अपने धार्मिक अर्थों से परे भी महत्व रखता है। यह समय की चक्रीय प्रकृति और धर्म (धार्मिकता), कर्म (कार्य), और मोक्ष (मुक्ति) के शाश्वत सिद्धांतों की याद दिलाता है। यह जाति, पंथ और भाषा की बाधाओं को पार करते हुए समुदायों के बीच एकता और एकजुटता की भावना को बढ़ावा देता है।

वैश्विक चुनौतियों और अनिश्चितताओं के मद्देनजर, हिंदू नववर्ष का उत्सव अतिरिक्त महत्व रखता है। यह आशा की किरण के रूप में कार्य करता है, व्यक्तियों को परिवर्तन अपनाने, बाधाओं को दूर करने और एक उज्जवल कल के लिए प्रयास करने के लिए प्रेरित करता है। जैसे ही दुनिया वर्ष 2024 में प्रवेश कर रही है, हिंदू नववर्ष खुशी, नवीनीकरण और सामूहिक पुनरुत्थान का समय हो, जो सभी के लिए शांति, समृद्धि और सद्भाव की शुरुआत करे।

Monday, March 18, 2024

बद्रीनाथ विधायक का इस्तीफ़ा थामा बीजेपी का दामन।

बद्रीनाथ विधायक का इस्तीफ़ा थामा बीजेपी का दामन।

उत्तराखंड कांग्रेस में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। लोकसभा उम्मीदवारों की घोषणा के बाद से ही पार्टी में इस्तीफों का दौर शुरू हो गया है, जोकि रुकने का नाम नहीं ले रहा है। इस बीच, बद्रीनाथ से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भंडारी ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और बीजेपी में शामिल हो गए हैं।

उत्तराखंड की बद्रीनाथ विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर राजेंद्र भंडारी जीते थे। उन्होंने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष को हराया था। रविवार को उन्होंने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया। उनका इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष ने मंजूर कर लिया है। अब यह सीट 17 मार्च से खाली हो गई है।

राजेंद्र भंडारी ने दिल्ली में सीएम पुष्कर सिंह धामी और अनिल बलूनी की मौजूदगी में बीजेपी की सदस्यता ली। राजेंद्र भंडारी ने बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की। राजेंद्र भंडारी ने कहा कि पीएम के कुशल नेतृत्व में देश आगे जा रहा है। हम उनके पदचिह्नों पर चलकर काम करेंगे। वहीं, धामी ने कहा कि वह हमारे द्वारा किए गए विकास कार्यों के चलते बीजेपी में शामिल हुए हैं।

Sunday, March 17, 2024

भारत के 2024 के लोकसभा चुनाव: समीक्षा और पूर्वानुमान


भारत के 2024 के लोकसभा चुनाव: समीक्षा और पूर्वानुमान


भारतीय लोकतंत्र में निरंतरता, बदलाव, और नई स्वर्णिम अवसरों की खोज का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है। 2024 के लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति में एक नई दिशा देने के प्रति निर्धारित हो सकते हैं। इन चुनावों के सामने कई चुनौतियाँ हो सकती हैं, साथ ही विभिन्न राजनीतिक दलों के आगे के प्रस्ताव और दृष्टिकोण भी प्रकट हो सकते हैं।

भारत के 2024 के लोकसभा चुनाव: समीक्षा और पूर्वानुमान


भारतीय राजनीति की वर्तमान स्थिति:

वर्तमान में, भारतीय राजनीति में कई महत्वपूर्ण तथ्य हैं जो 2024 के लोकसभा चुनावों को प्रभावित कर सकते हैं। पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राजनीतिक सीमाओं को चुनौती दी है और देश के विकास के लिए विभिन्न योजनाओं को प्रस्तुत किया है। दूसरे, प्रमुख विपक्षी दलों में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (आप), और अन्य कई छोटे और महत्वपूर्ण दल शामिल हैं।

भारत के 2024 के लोकसभा चुनाव: समीक्षा और पूर्वानुमान

मुद्दे और मुद्दों पर विचार:

2024 लोकसभा चुनाव के मुद्दे और विचार विभिन्न राजनीतिक दलों और जनता के बीच विवाद और चर्चा के विषय हो सकते हैं। कुछ मुख्य मुद्दे शामिल हो सकते हैं जैसे कि आर्थिक विकास, रोजगार, कृषि सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य, राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, और सामाजिक न्याय। इन मुद्दों पर विभिन्न दलों के बीच मतभेद और विचारविमर्श हो सकते हैं, जो चुनाव प्रक्रिया को रोचक और महत्वपूर्ण बनाता है।

आर्थिक विकास: भारत के आर्थिक विकास के मामले में सांख्यिकीय रूप से कई उदाहरण हैं, लेकिन कोविड-19 महामारी के प्रभावों के कारण अर्थव्यवस्था को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है।

रोजगार: विकास के साथ साथ, रोजगार की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। युवा और अधिकांश बेरोजगारों के लिए रोजगार के सम्बंध में नीतियों का मामला एक प्रमुख मुद्दा हो सकता है।

किसान मुद्दा: किसानों के मुद्दे पर ध्यान देना भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, खासकर उनकी आय को बढ़ाने के लिए किसानों की राहत के लिए कृषि नीतियों पर विचार किया जा रहा है।

Saturday, March 16, 2024

CAA लागू करने पर विदेशी मीडिया की मोदी पर टिप्पणी।

CAA लागू करने पर विदेशी मीडिया की मोदी पर टिप्पणी।

CAA लागू करने पर विदेशी मीडिया की मोदी पर टिप्पणी।

वर्ष 2019 में बने इस क़ानून को चार साल बाद मोदी सरकार ने लागू करने का फ़ैसला किया है.

जब ये क़ानून बना था तो देश के कई हिस्सों में इसे लेकर विरोध प्रदर्शन हुआ था.

सामाजिक कार्यकर्ता, मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाएं और समाज के एक तबके ने इस क़ानून को भारतीय संविधान की आत्मा के ख़िलाफ़ बताते हुए इसका विरोध किया था.

अब जब ये चुनावी साल में लागू किया जा रहा है तो विपक्षी पार्टियां इसे चुनावी दांव बता रही हैं.

सीएए को लेकर ना सिर्फ़ देश में बल्कि विदेशों में भी काफ़ी चर्चा है.

विदेशों में इसे कैसे देखा जा रहा है और इसकी कैसी चर्चा है, यही समझने के लिए हमने अंतराष्ट्रीय अख़बारों में इसकी कवरेज पर नज़र डाली.

अनुसार, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने इस क़ानून पर चिंता ज़ाहिर की है.

संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि ये ‘क़ानून मूल रूप से भेदभाव करने वाला’ क़ानून है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के कार्यालय के एक प्रवक्ता ने रॉयटर्स से कहा, "जैसा कि हमने 2019 में कहा था, हम चिंतित हैं कि भारत का नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 (सीएए) मूल रूप से भेदभावपूर्ण है और भारत के अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों का उल्लंघन है."

उन्होंने ये भी कहा कि हम नागरिकता संशोधन नियम जिसकी अधिसूचना जारी की गई है, उसे पढ़ रहे हैं और हमें देखना है कि ये अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार के नियमों के अनुरूप है या नहीं.

अमेरिका ने भी भारत के नए नागरिकता क़ानून को लेकर शंका ज़ाहिर की है.

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, "हम 11 मार्च को जारी किए गए नागरिकता संशोधन नियम की अधिसूचना को लेकर चिंतित हैं. हम बारीकी से देख रहे हैं कि यह अधिनियम कैसे लागू किया जाएगा."

“धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान और सभी समुदायों के लिए क़ानून के तहत समान व्यवहार मौलिक लोकतांत्रिक सिद्धांत हैं.”

रॉयटर्स लिखता है कि समाजिक कार्यकर्ता ये मानते हैं कि नेशनल सिटिजन रजिस्टर के साथ इस क़ानून को मिलाकर भारत के 20 करोड़ मुसलमानों से भेदभाव किया जाएगा, कुछ को ये भी डर है कि इससे कई ऐसे मुसलमान जो सीमा के पास के राज्यों में रहते हैं और जिनके पास दजस्तावेज़ नहीं हैं, उनकी नागरिकता जा सकती है.

मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस क़ानून के नोटिफ़ाई होने पर कहा, “सीएए धर्म के आधार पर भेदभाव को जायज़ बनाता है. यह अधिनियम अपनी संरचना में ही भेदभाव वाला है. ये क़ानून श्रीलंका के मुसलमानों और तमिल के प्रति भेदभाव करता है. नेपाल और भूटान जैसे देशों के प्रवासियों को नागरिकता से दूर रखता है.”

“साल 2019 में जब शांतिपूर्वक विरोध हो रहा था तो सुरक्षा एजेंसियों ने अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया, लोगों को हिरासत में लिया गया. हम अपील करते हैं कि प्रशासन लोगों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का सम्मान करे.”

Friday, March 15, 2024

उत्तराखण्ड की सड़को से जल्द हटेंगे पुराने विक्रम और सिटी बसें।

उत्तराखण्ड: प्रदेश भर के शहरों में बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए डीजल से चलने वाले पुराने विक्रम और सिटी बसें हटाईं जाएंगी। इसके लिए कैबिनेट ने उत्तराखंड स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति-2024 को मंजूरी दे दी। इस नीति के तहत पुराने वाहन को स्क्रैब करने और नए सीएनजी वाहन खरीदने पर सरकार 40 से 50 प्रतिशत तक सब्सिडी देगी। इसके अलावा वन पंचायतों में रह रहे 25 लाख लोगों को आजीविका से जोड़ने के लिए अधिकार दिए गए।

बृहस्पतिवार को सचिवालय में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। जिसमें आठ प्रस्तावों पर फैसला लिया गया। सचिव शैलेष बगौली ने कैबिनेट के निर्णयों की जानकारी देते हुए बताया कि शहरों में डीजल से संचालित पुराने वाहनों से बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए उत्तराखंड स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति 2024 को मंजूरी दी गई। इसके तहत देहरादून शहर से पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाएगा। जिसमें पुराने सिटी बस व विक्रम को स्क्रैब नहींं कराने वालों को पर्यावरण फ्रेंडली इलेक्ट्रिक व सीएनजी वाहन (25 से 32 सीटर) खरीदने के लिए कुल लागत का 40 प्रतिशत या अधिकतम 12 लाख तक सब्सिडी दी जाएगी। जबकि वाहन स्क्रैब का प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने पर नए वाहन खरीदने के लिए 50 प्रतिशत या अधिकतम 15 लाख रुपये की सब्सिडी दी जाएगी।


अन्य लिए गये फैसले इस प्रकार हैं-:

— उत्तराखंड संस्कृत शिक्षा नियमावली को मंजूरी।

— कार्मिक विभाग के अंतर्गत ज्येष्ठता नियमावली में संशोधन को मंजूरी। एक चयन के स्थान पर एक चयन वर्ष को मंजूरी।

— वन पंचायत संशोधन नियमावली को मंजूरी। इको टूरिज्म आदि को दिया जाएगा बढ़ावा।

— शहरी विकास विभाग के अंतर्गत हरिद्वार में यूनिटी मॉल के निर्माण को 0.9 हेक्टेयर भूमि हरिद्वार विकास प्राधिकरण को होगी हस्तांतरित।

— न्याय विभाग के अंतर्गत बागेश्वर, चम्पावत, चमोली, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी में कुटुंब न्यायालयों में 18 पदों को मंजूरी।

— न्याय विभाग के अंतर्गत देहरादून, हरिद्वार व रुड़की में पारिवारिक न्यायालयों की स्थापना होगी। इसके लिए नौ पदों को मंजूरी।

— आदि कैलाश पैदल यात्रा को प्रोत्साहित किए जाने व इस क्षेत्र में होम स्टे को बढ़ावा दिए जाने का निर्णय लिया गया।


Wednesday, March 13, 2024

क्या लोकसभा से संसद पहुंच पाएंगे बॉबी पंवार बड़कोट मे हुआ जोरदार स्वागत।

उत्तराखंड बेरोजगार संघ के अध्यक्ष बॉबी पंवार की जन आशीर्वाद यात्रा का बड़कोट नगरपालिका क्षेत्र में पहुंचने पर जोरदार स्वागत किया गया। इस दौरान बाॅबी पंवार ने जन आशीर्वाद यात्रा के तहत मुख्य चौराहे पर सभा को संबोधित किया।

बाॅबी पंवार ने जन आशीर्वाद यात्रा के तहत मुख्य चौराहे पर सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब बेरोजगार संघ सड़कों पर उतरकर नकल विरोधी कानून लागू करने को लेकर सरकार को मजबूर कर सकता है तो भू कानून, मूल निवास कानून आदि क्यों नहीं ला सकता है, लेकिन इसके लिए हमें आंदोलन का दायरा बढ़ाना होगा। इसके लिए सड़क से लेकर सदन तक लड़ाई लड़नी होगी।

उन्होंने टिहरी लोकसभा से जनता से आशीर्वाद मांगा। इस दौरान उन्होंने तिलाडी शहीद स्मारक स्थल पर पहुंचकर वीर तिलाडी शहीदो को नमन करते हुए उनकी प्रेरणा से आगे बढ़ने का संकल्प लिया।

Sunday, March 3, 2024

ऐतिहासिक चांदपुर गढ़ी एक बेहतरीन पर्यटन स्थल

चांदपुर गढ़ी किला उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है । चांदपुर गढ़ी किला कर्णप्रयाग और गैरसैंण के बीच स्थित है। अटागढ़ नदी के किनारे एक टीले पर स्थित चांदपुर गढ़ी किला, पंवार शासकों और गढ़वाल की कहानी कहता है। यह चांदपुर गढ़ी किला एक ऐतिहासिक पर्यटक आकर्षण है जो चमोली की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच स्थित है।

गढ़वाल के इतिहास की शुरुआत कत्यूरी राजाओं से मानी जाती है। कत्यूरी राजाओं ने 10वीं शताब्दी तक जोशीमठ में शासन किया और फिर 11वीं शताब्दी के आसपास अपनी राजधानी को अल्मोडा में स्थानांतरित कर दिया। जब कत्यूरी राजाओं ने गढ़वाल छोड़ कर अल्मोड़ा को अपनी राजधानी बनाया तो यहां कई छोटे-छोटे किले उभरे, जिनमें चांदपुर गढ़ी प्रमुख था।

चांदपुर गढ़ी को बहुत शक्तिशाली गढ़ माना गया है। यहां मिले प्राचीन अभिलेखों और पुरातत्व विभाग के साक्ष्यों से प्राप्त जानकारी के आधार पर कहा जाता है कि राजा कनक पाल , जो गढ़वाल के एक शक्तिशाली राजा थे, संवत में मालवा (जो आधुनिक मध्य प्रदेश में है) से गढ़वाल आए थे। 755 ई. में स्वयं को राजा सोनपाल का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। राजा कनकपाल ने चांदपुर गढ़ी को अपनी राजधानी के रूप में स्थापित किया।

चांदपुर गढ़ी के इतिहास को लेकर इतिहासकार एक मत नहीं हैं। इतिहासकार अभी तक यह स्पष्ट रूप से नहीं बता पाए हैं कि चांदपुर गढ़ी वास्तव में कब राजधानी बनी। कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है कि कनक पाल 699 में मालवा की धारा नगरी से यहाँ आये थे और कुछ का मानना ​​है कि वे गुर्जर देश (आधुनिक गुजरात) से आये थे।

चांदपुर गढ़ी किले का इतिहास करीब 1300 साल पुराना है। ऐसा माना जाता है कि 8वीं-9वीं शताब्दी में गढ़वाल क्षेत्र कई छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था। उसी समय चांदपुर गढ़ी में भानु प्रताप नामक शासक राज्य करता था। उन्होंने अपनी बेटी का विवाह कनक पाल नामक राजकुमार से तय किया, जो गुजरात के धारानगर से आया था और फिर चांदपुर का राज्य कनक पाल को दे दिया। इन्हीं कनक पाल ने गढ़वाल में पँवार वंश की स्थापना की। गढ़वाल का अर्थ है 52 किलों का समूह। उत्तराखंड में बावन किले हैं। उन्हीं किलों में से एक है चांदपुर गढ़ी किला।

पँवार वंश के अंतिम राजा राजा अजय पाल थे। 37वें राजा अजय पाल ने यहां के 52 गढ़ों को समेकित किया और बाद में इस क्षेत्र का नाम गढ़वाल रखा। यहीं से राजा अजय पाल ने गढ़वाल पर अपना शासन कार्य किया था। राजा अजय पाल ने बाद में अपनी राजधानी चांदपुर गढ़ी से बदलकर देवलगढ़ कर ली और उसके बाद राजधानी देवलगढ़ से बदलकर श्रीनगर कर दी गई, क्योंकि उस समय लगातार बाहरी हमले हो रहे थे, जिसके कारण राजा अजय पाल ने अपने राज्य को सुरक्षित रखने के लिए ऐसा निर्णय लिया। देवलगढ़ वर्तमान समय में पौडी जिले में स्थित है।

चांदपुर गढ़ी पूरा वीडियो यूट्यूब पर यहाँ देखें 👇👇👇

कृपया लिंक पर क्लिक करें👇👇👇

https://youtu.be/z74qZb_7JqU

Raj B Entertainment

Saturday, November 19, 2022

इस गाँव जाने के बाद कभी नहीं आती गरीबी

 आपने दुनिया की कई अनोखी जगह के बारे में तो सुना होगा उन्हीं अनोखी जगह में से एक जगह है उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित माणा गांव । माणा गांव को भारत का अंतिम गांव भी कहा जाता है कहा जाता है कि जो भी यहां जाता है उसकी गरीबी हमेशा के लिए दूर हो जाती है और इसके पीछे की कई घटनाओं का जिक्र यहां पर किया जाता है  माना जाता है कि यह गांव शाप मुक्त है और भगवान शिव की यहां पर असीम कृपा सब पर बनी रहती है जो भी इस गांव में जाता है उस पर शिव की कृपा बनी रहती है और इस गांव में जाने से आदमी की दरिद्रता हमेशा के लिए दूर हो जाती है  यहां जाने से यह भी मान्यता है कि पाप मिट जाते हैं और भगवान शिव की कृपा उसको प्रदान होती है

 यह गांव प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ एक अनोखा गांव भी है

 माना जाता है कि कई वर्षों पूर्व भारत और तिब्बत के बीच व्यापार यहीं से होता था उसी में एक व्यापारी था जिसका नाम माणिक शाह था माणिक  एक दिन व्यापार करने के लिए तिब्बत जा रहा था तो रास्ते में कुछ लुटेरों ने उसे रोककर उसकी गर्दन काट दी गर्दन काटने  के बाद भी उसके मुंह से शिव के लिए ही प्रार्थना निकल रही थी यह देखकर भगवान शिव बहुत खुश हुए और उसे वराह का सिर लगाकर वहां पर जीवित कर दिया तब से वहां पर माणिक भद्र की पूजा की जाती है भगवान शिव ने माणिक भद्र को वरदान दिया कि जब भी कोई यहां पर आए  और पूजा करे तो तुम उनकी दरिद्रता दूर करोगे।

 एक और मान्यता के अनुसार यह भी माना जाता है कि  भगवान श्री गणेश के कहने पर वेदव्यास जी ने यहीं पर महाभारत की रचना की थी और महाभारत के युद्ध के समापन के बाद पांडव द्रोपदी समेत यही से स्वर्ग के लिए गए थे तो कहां जाता है कि यहीं से स्वर्ग की सीड़ियों का  प्रारंभ होता है

उत्तराखण्ड  को यूँ ही  नहीं देवों  कि भूमि कहा जाता है।

एक बार जरूर इस गांव  को जाएँ क्या पता वहां से आपकी किस्मत बदल जाये।


#राज् बिष्ट







Friday, November 18, 2022

देश को कैसे खा रहा है आरक्षण रुपी दानव

 आरक्षण ?? इस शब्द को सुनते ही दो तरह के लोगो के चेहरे सामने उरने लगते हैं। एक वो जो कहते हैं आरक्षण का होना  सही नही है और दूसरे वो जो कहते हैं आरक्षण का होना सही है। आज का आरक्षण  दो धारी तलवार की तरह है । और इस वक़्त हम जिस धार का प्रयोग कर रहे हैं वो पूर्ण  से नुकसान देने वाली है। सही धार पकड़ने के लिए आईये इसे समझते हैं।

पहले ये जान लेते हैं कि आरक्षण है क्या??
आरक्षण का सीधे शब्दों में कहूँ तो इसका मतलब है किसी विशेष प्रकार की छूट। वर्तमान में इसे किसी विशेष समुदाय या जातियों को दिया जाता है।
बाबा साहेब ने संविधान का निर्माण किया। उन्होंने संविधान निर्माण करते हुए ये साफ लिखा है कि सब एक समान हैं कोई बड़ा या छोटा नहीं। किसी की जाती बड़ी या छोटी नही और न ही किसी का धर्म बड़ा या छोटा है।
सबको समान रूप से एक इंसान मनाने वाले बाबा साहेब कैसे किसी को जाती और धर्म के नाम पर आरक्षण देने की वकालत कर सकते थे।


बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में आरक्षण जोड़ा इसलिए कि जो पिछड़े लोग हैं और पिछड़े लोग वो जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। उन्हें सबकी तरह एक समान स्तर तक लाया जा सके और उन्हें समाज मे बराबरी पर लाने के लिए आर्थिक रूप से आरक्षण के रूप में सहायता मिले। किन्तु हुआ ऐसा नही।

आरक्षण को जातिगत फायदे के लिए और वोटों के लिए बांट दिया गया। एकसमान देश के एक जैसे लोग बँट गए जाती और धर्म में।कोई अल्पसंख्यक आरक्षण में आ गए तो कोई अनुसूचित जाति तो कोई अनुसूचित जनजाति के रूप में समाज मे बँट गए। सब एक समान हैं वाला नारा जाती और धर्मो में बंट गया।
आज आरक्षण को जाती और धर्म के आधार पर दिया जाना किसी भी आधार पर उचित नही ठहराया जा सकता है। हम सब मिलकर एक समृद्ध और विशाल भारत बनाने का सपना देखते हैं और उस सपने को साकार करने के लिए होनहार लोगो की आवश्यकता होगी परन्तु आरक्षण नाम का कीड़ा उन होनहारों के रास्ते मे दीवार बनकर बैठा है। इस बात को इस तरह समझते हैं कि किसी गरीब सामान्य वर्ग के परिवार का कोई होनहार बालक किसी प्रतिस्पर्धा में 80 प्रतिशत अंक प्राप्त करता है  और उसकी प्रतिभाग करने की शुल्क 500 रुपये तक होती है। किंतु उसको नही चुना जाता है। परंतु किसी तथाकथित जातिगत या विशेष समुदाय के संपन्न परिवार के बालक को 60 प्रतिशत लाने पर भी उस प्रतिस्पर्धा में चुन लिया जाता है और उसकी प्रतिस्पर्धा में भाग लेने का शुल्क 250 रुपये मात्र होता है।



अब जो बालक सिर्फ इसलिए नही चुना जाता है कि वो सामान्य वर्ग से है उसने मेहनत भी ज्यादा की है  शुल्क भुगतान भी  ज्यादा किया है अंक भी अधिक प्राप्त किये हैं तब सोचिये उसकी पूर्ण मेहनत करने के बाद भी असफलता हासिल होने पर उसकी मनोदशा उसे किस दिशा में ले जाएगी। इसी तरह हम कई होनहार प्रतिभाओं को खो देते हैं।
सिर्फ जातिगत और समुदायिक आरक्षण के आधार पर हम एक होनहार प्रतिभा को नही चुन पाते हैं। जबकि आर्थिक आधार पर वो उन आरक्षित लोगो से बहुत पीछे है जो तथाकथित रूप से पिछड़े हुए हैं।
मैं ये नही कहता हूं कि आरक्षण नही देना चाहिए बस ये कहना चाहता हूं की आरक्षण जाति या समुदाय को नही उन लोगो को दिया जाना चाहिए जो वाकई इसके हकदार हैं। जो आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं उन्हें उबारने के लिए आरक्षण होना चाहिए। एक देश मे सब एक समान हैं तो किसी जाति और समुदाय के लिए आरक्षण कैसे हो सकता है। उस समय जब आरक्षण को संविधान में शामिल किया गया हो सकता है उस वक़्त के हिसाब से वो सही रहा हो किन्तु  आज के वक्त में इसे किसी भी स्तर पर सही नही कह सकते हैं हमे आरक्षण नीति को वक़्त की मांग के साथ बदलना होगा और इसे जातिय और समुदायिकता से उखाड़ फ़ेंककर गरीब और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो की सही पहचान कर उन्हें मुहैया कराना होगा।
आरक्षण का प्रयोग सही तरीके से और सही लोगों के उपयोग में लाना होगा। इससे जो सम्पन्न लोग हैं और आरक्षण ( जातीय या सामुदायिक आरक्षण) का फायदा पीढ़ी दर पीढ़ी सम्पन्न होने के बाद भी उठा रहे हैं उनसे हटाकर गरीब और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो को देने से देश की दिशा और दशा दोनों में सुधार होगा। बाबा साहेब अम्बेडकर के सपने ( सब समान हों ) को साकार करना है तो जातिगत और समुदायिक आरक्षण को बदलकर आर्थिक आरक्षण की नीति में लाना होगा। एक दूरदृष्टि और सही निर्णय की सख्त आवश्यकता है अगर हम ये करने में साकार हो जाते हैं तो भारत को आगे बढ़ने या बल्कि यूँ कहें कि विश्वगुरु बनने की दिशा में बढ़ने से कोई नही रोक सकता है।
राज बिष्ट।

Thursday, November 17, 2022

पलेठी सूर्य मंदिर की किसी को सुध नहीं ख़त्म हो रही है महान विरासत



सूर्य मंदिर का नाम सुनते ही हमारे सामने कोणार्क के सूर्य मंदिर की छवि बन जाती है, पर ऐसे ही दो सूर्य मंदिर और हैं जिनमे से एक कटारमल अल्मोड़ा में स्तिथ है तथा दूसरा पलेठी टिहरी गढ़वाल में।और मैं जिस सूर्य मंदिर के बारे में लिख रहा हूँ वो है टिहरी गढ़वाल की देवप्रयाग तहसील के ब्लॉक हिंडोलाखाल से 10 किलोमीटर की दूरी पर पलेठी गांव में स्तिथ ।



यह एक प्राचीन सूर्य मंदिर। मान्यता अनुसार 7वीं-8 वीं शताब्दी की प्राचीन अवधि से संबंधित गढ़वाल में हिंडोलाखाल से 10 किमी दूर यह सूर्य मंदिर, लुलेरा गुलेरा घाटी में स्थित हैं। अगर हम स्थानीय लोगों पर विश्वास करते हैं, तो ग्रामीणों द्वारा खुदाई में मंदिरों का एक समूह मिला था। जिनमे एक यह सूर्य मंदिर तथा एक शिव मंदिर प्राप्त हुए थे। भारत मे कोणार्क और कटारमल के अलावा तीसरा सूर्य मंदिर यंही स्तिथ है। इस सूर्य मंदिर के पत्थरों पर कौन सी लिपि में लिखा गया है ये आज भी एक चर्चा और खोज का विषय है। कुछ पत्थरों पर पाया गया है कि इनपर ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है पर कुछ पर अभी स्तिथि स्पष्ट नही है भारतीय पुरातत्व विभाग के डॉ एसएन घई और डॉ के.वी. रमेश, ने 22 अक्टूबर 1968 को मंदिर के शिलालेखों का अध्ययन किया। महाराजाधिरराज परमेश्वर कल्याण वर्मन का नाम ब्रह्मी में संरचना पर एक प्रमुख उल्लेख पाया गया है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, सूर्य मंदिर 7वीं -8वीं शताब्दी के दौरान बनाए गए थे जब यह क्षेत्र ब्रह्मपुर के वरमानों के शासनकाल में था। अपने आप मे कई अनोखे राज समेटे यह सूर्य मंदिर पर्यटन और आध्यात्मिक दृष्टि से कई बड़ी संभावनाएं समेटे हुए है। इस मंदिर का डिजाइन अपने आप मे अलग और दुर्लभ है। आद्यात्मिकता और पर्यटन को साथ संजोने की दृष्टि से ये भारत की कुछ चुनिन्दा जगहों में से एक है।





पलेठी में सूर्य मंदिर इस अर्थ में विशेष हैं कि ये दक्षिण भारतीय परंपरा से अलग है। इस सूर्य मंदिर के पास में एक और मंदिर स्तिथ है जो भगवान भोलेनाथ का मंदिर है जो श्री चमनेश्वर महादेव के नाम से विख्यात है। दोनों मंदिर संस्कृतिक विरासत को संभाले हुए है किंतु सरकार और सरकारी मशीनरी के ढीले रवैये के कारण ये आज जिस जर्जर स्तिथि में है उसे गांव ही नही अपितु पूरे क्षेत्र के लोगो मे निराशा की भावना है उचित रखरखाव की कमी के कारण यह सूर्य मंदिर विलुप्त होने के कगार पर है। प्राचीन संरचनाएं जिनमें पुरातात्विक महत्व है, वे उचित रखरखावों न होने के कारण बर्बाद हो रहे हैं। आज इस मंदिर के पास में सड़क पहुंच गई है जिससे यंहा पहुंचना बहुत आसान हो गया है और इसके पुनः जीर्णोद्धार के लिए ज्यादा मेहनत की भी जरूरत नही पड़ेगी पर कोई भी सरकार या जिला प्रशासन इसकी सुध नही लेता है। अगर प्रशासन और सरकार इसपर ध्यान देते हैं तो भविष्य में हमारी इस महान धरोहर को एक बडे पर्यटन क्षेत्र के रूप में देखा जा सकता है। बस जरूरत है एक पहल की।

#राजबिष्ट


Wednesday, November 16, 2022

धर्मांतरण का कानून होगा सख्त। 10 साल की सजाI

 मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मंत्रिमंडल की बैठक बुधवार को राज्य सचिवालय में हुई।


 

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में 26 मामले सामने आए। जिसमें एक मामले को छोड़कर सभी 25 प्रस्ताव पास किए गए। 

इस दौरान धर्मांतरण का कानून सख्त करने का फैसला हुआ। अब उत्तराखंड में धर्मांतरण कानून गैर जमानती हुआ। इसमें 10 साल की सजा होगी।धामी कैबिनेट में 25 अहम प्रस्तावों पर मुहर लगी। इस दौरान नैनीताल हाईकोर्ट को शिफ्ट करने को लेकर बड़ा फैसला हुआ। बैठक में नैनीताल हाईकोर्ट को हल्द्वानी में शिफ्ट करने की सैद्धांतिक मंजूर दी गई। बता दें, नैनीताल हाईकोर्ट को शिफ्ट करने की लंबे समय से मांग चल रही थी।



धर्मांतरण का कानून होगा सख्त। 10 साल की सजा

नैनीताल हाईकोर्ट हल्द्वानी शिफ्ट करने पर सैद्धांतिक मंजूरी।

पशुपालकों को महंगे भूसे से राहत, सरकार ने सब्सिडी बढ़ाई।

भूसे और साइलेज पर बढ़ी सब्सिडी।

कौशल विकास केंद्र संचालको को भुगतान के बदले नियम।

अब तीन नहीं चार किश्तों में मिलेगा संचालकों को प्रशिक्षण का भुगतान।

सहकारिता की तर्ज पर दुग्ध विकास विभाग भी देगा 75 फीसदी सब्सिडी। अभी तक 50 फीसदी थी।

दुग्ध सहकारी समितियों से जुड़े 52 हजार पशुपालकों को मिलेगा लाभ। 

प्रयास करने वालो का भगवान भी साथ देते की हैं ।

 बहुत समय पहले की बात है , किसी गाँव में एक किसान रहता था . उसके पास बहुत सारे जानवर थे , उन्ही में से

एक गधा भी था . एक दिन वह चरते चरते खेत में बने एक पुराने सूखे हुए कुएं के पास जा पहुचा और अचानक ही उसमे फिसल कर गिर गया . गिरते ही उसने जो...र -जोर से चिल्लाना शुरू किया -” ढेंचू-ढेंचू ….ढेंचू-ढेंचू ….”

उसकी आवाज़ सुन कर खेत में काम कर रहे लोग कुएं के पास पहुचे, किसान को भी बुलाया गया .

किसान ने स्थिति का जायजा लिया , उसे गधे पर दया तो आई लेकिन उसने मन में सोचा कि इस बूढ़े गधे को बचाने से कोई लाभ नहीं है और इसमें मेहनत भी बहुत लगेगी और साथ ही कुएं की भी कोई ज़रुरत नहीं है , फिर उसने बाकी लोगों से कहा , “मुझे नहीं लगता कि हम किसी भी तरह इस गधे को बचा सकते हैं अतः आप सभी अपने-अपने काम पर लग जाइए, यहाँ समय गंवाने से कोई लाभ नहीं.”

और ऐसा कह कर वह आगे बढ़ने को ही था की एक मजदूर बोला, ” मालिक , इस गधे ने सालों तक आपकी सेवा की है , इसे इस तरह तड़प-तड़प के मरने देने से अच्छा होगा की हम उसे इसी कुएं में दफना दें .”

किसान ने भी सहमती जताते हुए उसकी हाँ में हाँ मिला दी.

” चलो हम सब मिल कर इस कुएं में मिटटी डालना शुरू करते हैं और गधे को यहीं दफना देते हैं”, किसान बोला.

गधा ये सब सुन रहा था और अब वह और भी डर गया , उसे लगा कि कहाँ उसके मालिक को उसे बचाना चाहिए तो उलटे वो लोग उसे दफनाने की योजना बना रहे हैं . यह सब सुन कर वह भयभीत हो गया , पर उसने हिम्मत नहीं हारी और भगवान् को याद कर वहां से निकलने के बारे में सोचने लगा ….

अभी वह अपने विचारों में खोया ही था कि अचानक उसके ऊपर मिटटी की बारिश होने लगी, गधे ने मन ही मन सोचा कि भले कुछ हो जाए वह अपना प्रयास नहीं छोड़ेगा और

आसानी से हार नहीं मानेगा। और फिर वह पूरी ताकत से उछाल मारने लगा .

किसान ने भी औरों की तरह मिटटी से भरी एक बोरी कुएं में झोंक दी और उसमे झाँकने लगा , उसने देखा की जैसे ही मिटटी गधे के ऊपर पड़ती वो उसे अपने शरीर से झटकता और उछल कर उसके ऊपर चढ़ जाता .जब भी उसपे मिटटी डाली जाती वह यही करता ….झटकता और ऊपर चढ़ जाता …. झटकता और ऊपर चढ़ जाता ….

किसान भी समझ चुका था कि अगर वह यूँ ही मिटटी डलवाता रहा तो गधे की जान बच सकती है .



फिर क्या था वह मिटटी डलवाता गया और देखते-देखते गधा कुएं के मुहाने तक पहुँच गया, और अंत में कूद कर बाहर आ गया.

मित्रों, हमारी ज़िन्दगी भी इसी तरह होती है , हम चाहे जितनी भी सावधानी बरतें कभी न कभी मुसीबत रुपी गड्ढे में गिर ही जाते हैं .पर गिरना प्रमुख नहीं है, प्रमुख है संभलना . बहुत से लोग बिना प्रयास किये ही हार मान लेते हैं , पर जो प्रयास करते हैं भगवान् भी किसी न किसी रूप में उनके लिए मदद भेज देता है।

Tuesday, November 15, 2022

हटाए गये विधानसभा कर्मचारियों की नहीं होगी बहाली

 विधानसभा के हटाए गए कर्मचारियों की बहाली नैनीताल हाईकोर्ट के ऑर्डर के बाद भी नहीं हो पाई है। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी ने कहा कि इन कर्मचारियों को लेकर विधिक राय ली जा रही है और उसके बाद ही इनके संदर्भ में निर्णय लिया जाएगा। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी ने 2016 के बाद विधानसभा में हुई भर्तियों को निरस्त करते हुए 250 कर्मचारियों को हटा दिया था।

कर्मचारी इस फैसले के खिलाफ कोर्ट गए तो नैनीताल हाईकोर्ट ने 15 अक्तूबर को स्पीकर के फैसले पर स्टे दे दिया। 



कर्मचारी वापस ज्वाइनिंग के लिए आए तो विधानसभा सचिवालय ने कर्मचारियों को रिसीविंग तो दी लेकिन उन्हें अग्रिम निर्देशों तक कार्यालय न आने को कह दिया।


आप अपनी राय जरूर दे



Sunday, November 13, 2022

हरचण लैगी भाषा निचन्त होण लैगी संस्कृति। (खोने लगी भाषा खत्म होने लगी संस्कृति)

  

हरचण लैगी भाषा निचन्त होण लैगी संस्कृति।

(खोने लगी भाषा खत्म होने लगी संस्कृति)

जी हाँ ये एक पंक्ति ही अपने आप मे सबकुछ कह जाती है। आज उत्तराखंड की विलुप्त होती गढ़वाली और कुमाउनी भाषा उत्तराखंड की संस्कृति को भी विलुप्ति की दिशा में ले जा रही हैं।

 किसी भी संस्कृती की पहचान वहां की भाषा, वहां की वेशभूषा होती है। गढ़वाली और कुमाउनी उत्तराखण्ड की प्रमुख बोली जाने वाली दो भाषाएँ हैं किंतु आज ये दोनों भाषाएँ विलुप्ति की दिशा में अग्रसर हैं। आज की इस भागती दौड़ती जिंदगी में रोजगार और शिक्षा के अलावा भी अन्य कई कारणों से उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन अपने चरम पर है, जिस कारण से लोगो को पहाड़ो से शहरों की तरफ भागना पड़ रहा है। लोग पहाड़ो से शहर में आकर वहीं बस जाते हैं और वहां की वेशभूषा वहां की भाषा को ही अपना लेते हैं और यहां तक कि उनके बच्चों को अपनी मूल भाषा का ज्ञान भी नही होता है। इसी कतार में कुछ लोग वो भी हैं जो दिखावटीपन के लिए भी अपनी मूल भाषा नही बोलते हैं। और कुछ लोगों को अपनी भाषा को बोलने में शर्म भी आती है। इसी तरह से गढ़वाली और कुमाउनी भाषा बोलने वालों की संख्या में हर साल कमी आ रही है और इस कमी के कारण उत्तराखण्ड की महान विरासत हमारी महान संस्कृति धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। 

पुराने वक़्त में कौथिक (थौल), सामूहिक नृत्य, सामूहिक गान इस तरह से कई अन्य आयोजन हमारी भाषा और संस्कृति को संजोकर रखते थे और लोगो के बीच मे प्रेमभाव बनाये रखने में बेजोड़ थे। किंतु आज दो गढ़वाली आपस मे गढ़वाली में और दो कुमाउनी आपस मे कुमाउनी में बात नही करते। दूसरी भाषाओं को बोलने की होड़ लगी हुई है । अपनी भाषा में बात करने में शर्म महशूश करते हैं। जबकि हमें अपनी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए।

हमारे अपने इस तरह के लोग हैं जो अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।

उनकी तुलना में कुछ लोग अभी ऐसे भी हैं जो आज भी देश या विदेशों में रहकर अपनी गढ़वाली या कुमाउनी भाषा को खुद भी बोलते हैं और अपने बच्चों को भी सिखाते हैं। यहां तक वो अपनी संस्कृति को अपने और अपने बच्चों के माध्यम से पूरे देश ही नही विदेश में भी प्रचार करते हैं।कई लोग इस दिशा में कार्य कर रहे हैं।

मेरा यह लेख किसी भी भाषा के खिलाफ नही है किंतु मैं ये कहना चाहता हूं कि आप अपने बच्चों को सब तरीके की भाषा सिखाऐं किन्तु अपनी गढवाली या कुमाउनी भाषा को सीखाना बिल्कुल न भूलें। अपनी भाषा को बचाये रखें अपनी संस्कृति बची रहेगी।

हो सके तो अपने गावों में कुछ पारम्परिक रीति रिवाजों को फिर साथ मिलकर सामूहिक रूप से मनाएं। अपनी भाषा अपनी संस्कृति के मेल मिलाप को संजोकर रखें।

क्योंकिं इतिहास गवाह है जिनकी भाषा खोई संस्कृति खोई उनका फिर नामो निशान भी मिट गया।

आप जहां भी रहें किन्तु अपनी गढवाली और कुमाउनी भाषा के साथ - साथ अपनी संस्कृति को बनाये रखें बचाये रखें। अपनी मातृभाषा को बोलने में न हिचकें और न शर्म करें। अपनी भाषा अपनी संस्कृति पर गर्व करें। आज के इस आधुनिक युग मे हमे टेक्नोलॉजी और अपनी सांस्कृतिक धरोहर अपनी भाषा को साथ लेकर चलना होगा ।

त आवा अपणी भाषा अपणी संस्कृति तैं बाचौण का खातिर आज संकल्प करदा कि अपणी भाषा बोलला और अपणी संस्कृति तै दुनिया मा फैलोला।

(तो आओ आज अपनी भाषा और संस्कृति बचाने के लिए आज संकल्प करते हैं कि अपनी भाषा बोलेंगे और अपनी अपनी संस्कृति को दुनिया तक फैलाएंगे)

#राज बिष्ट


जब रावण को मंदोदरी ने कहा राम का अवतार धारण कर लो।

 रावण सीता को समझा समझा कर

हार

गया था पर

सीता ने रावण की तरफ

एक बार देखा तक नहीं, तब

मंदोदरी ने

उपाय बताया कि तुम राम बन के

सीता के

पास जाओ वो तुम्हे जरूर देखेगी।



रावण ने कहा - मैं ऐसा कई बार कर

चुका हू

मंदोदरी - तब क्या सीता ने

आपकी ओर देखा

रावण - "मैं खुद सीता को नहीं देख

सका...क्योंकि मैं जब-जब राम बनता हूँ

मुझे

परायी नारी

अपनी माता और

अपनी पुत्री सी दिखती है

----।"

अपने अंदर राम को ढूंढे,

और उनके चरित्र पर चलिए ।

आपसे भूलकर भी

भूल नहीं होगी ।।

Friday, August 5, 2022

क्या यही है सपनो का भारत

 भारत सदियों से एक ऐसा देश रहा हैं जहाँ हर प्रकार के लोगो को समाहित करने का माद्दा है



भारत ने न कभी किसी देश पर इस उद्देश्य से आक्रमण किया की उसकी जमीन पर कब्ज़ा किया जाए और न कभी इस उद्देश्य से की किसी देश को आगे बढ़ने से रोका जाए भारत ने हमेशा से ही वसुधैव कुटुंबकम की अपनी नीति को अपनाया है और हमेशा ही उसपर कायम रहा है इतिहस गवाह है की जिसने भी यहाँ आकर यहाँ के रीति रिवाजो और यहाँ की संस्कृति को मिटाना चाहा या तो वो खुद मिट गया या फिर यहीं की संस्कृति में रम गया

भारत एक समागम का देश है जो ठीक उस फूलों के गुच्छे की तरह है जो कई तरह के फूलों को खुद में  समाये हुए है 

अपनी भिन्नताओ और अनेकता में एकता के लिए ही भारत को जाना जाता है 

 पर आज ऐसा दौर आ गया है जब हमने अपने सब नैतिक मूल्यों को खो दिया है हम इतने स्वार्थी हो गए हैं की जो हमारे स्वार्थ का कार्य न हो उसे करने के लिए हजार बार सोचते हैं चाहे वो कार्य कितना ही देशहित में  महत्वपूर्ण और आवशयक  क्यों न हो 

स्वच्छता  और समानता  का जो भाव हमारे  दिलो में होता था वो कहीं खो सा गया है एक दूसरे से निस्वार्थ मिलने की भावना कहीं बिखर के रह गयी है 

आज हम अपने आजादी के महान शहीदों को  सिर्फ स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर याद करते हैं उनकी कुर्बानियों  को भूल गये हैं 

हमने अपने सभी नैतिक मूल्यों का त्याग कर दिया है 

भारत को विकसित और संपन्न सिर्फ आर्थिक रूप से बनाना ही नहीं बल्कि उसकी जो सामाजिक समरसता है उससे भी बरकार रखना है 

जब हम अपने नैतिक मूल्यों को सही से समझ पाएंगे तब जाके ही कहीं एक समृद्ध विकसित सपनो के भारत का निर्माण हो पायेगा 

आपके कुछ विचार हों तो  कमेंट में जरूर लिखें 

राज बिष्ट  

Tuesday, July 26, 2022

जब पिप्पलाद ने शनि देव को जला दिया था

जब पिप्पलाद ने शनि देव को जला दिया था 

श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं.. इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।


एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-



नारद - बालक तुम कौन हो ?


बालक - यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।


नारद - तुम्हारे जनक कौन हैं ?


बालक - यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।


तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि -


हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।


बालक - मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?


नारद - तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।


बालक - मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?


नारद - शनिदेव की महादशा।


इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।


नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी। 


ब्रह्मा जी से वर् मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनिदेव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।



शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-


1 - जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा.. जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।


2 - मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

 

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे। अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।


सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है। आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की, जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है.. 

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