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Saturday, November 19, 2022

इस गाँव जाने के बाद कभी नहीं आती गरीबी

 आपने दुनिया की कई अनोखी जगह के बारे में तो सुना होगा उन्हीं अनोखी जगह में से एक जगह है उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित माणा गांव । माणा गांव को भारत का अंतिम गांव भी कहा जाता है कहा जाता है कि जो भी यहां जाता है उसकी गरीबी हमेशा के लिए दूर हो जाती है और इसके पीछे की कई घटनाओं का जिक्र यहां पर किया जाता है  माना जाता है कि यह गांव शाप मुक्त है और भगवान शिव की यहां पर असीम कृपा सब पर बनी रहती है जो भी इस गांव में जाता है उस पर शिव की कृपा बनी रहती है और इस गांव में जाने से आदमी की दरिद्रता हमेशा के लिए दूर हो जाती है  यहां जाने से यह भी मान्यता है कि पाप मिट जाते हैं और भगवान शिव की कृपा उसको प्रदान होती है

 यह गांव प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ एक अनोखा गांव भी है

 माना जाता है कि कई वर्षों पूर्व भारत और तिब्बत के बीच व्यापार यहीं से होता था उसी में एक व्यापारी था जिसका नाम माणिक शाह था माणिक  एक दिन व्यापार करने के लिए तिब्बत जा रहा था तो रास्ते में कुछ लुटेरों ने उसे रोककर उसकी गर्दन काट दी गर्दन काटने  के बाद भी उसके मुंह से शिव के लिए ही प्रार्थना निकल रही थी यह देखकर भगवान शिव बहुत खुश हुए और उसे वराह का सिर लगाकर वहां पर जीवित कर दिया तब से वहां पर माणिक भद्र की पूजा की जाती है भगवान शिव ने माणिक भद्र को वरदान दिया कि जब भी कोई यहां पर आए  और पूजा करे तो तुम उनकी दरिद्रता दूर करोगे।

 एक और मान्यता के अनुसार यह भी माना जाता है कि  भगवान श्री गणेश के कहने पर वेदव्यास जी ने यहीं पर महाभारत की रचना की थी और महाभारत के युद्ध के समापन के बाद पांडव द्रोपदी समेत यही से स्वर्ग के लिए गए थे तो कहां जाता है कि यहीं से स्वर्ग की सीड़ियों का  प्रारंभ होता है

उत्तराखण्ड  को यूँ ही  नहीं देवों  कि भूमि कहा जाता है।

एक बार जरूर इस गांव  को जाएँ क्या पता वहां से आपकी किस्मत बदल जाये।


#राज् बिष्ट







Friday, November 18, 2022

देश को कैसे खा रहा है आरक्षण रुपी दानव

 आरक्षण ?? इस शब्द को सुनते ही दो तरह के लोगो के चेहरे सामने उरने लगते हैं। एक वो जो कहते हैं आरक्षण का होना  सही नही है और दूसरे वो जो कहते हैं आरक्षण का होना सही है। आज का आरक्षण  दो धारी तलवार की तरह है । और इस वक़्त हम जिस धार का प्रयोग कर रहे हैं वो पूर्ण  से नुकसान देने वाली है। सही धार पकड़ने के लिए आईये इसे समझते हैं।

पहले ये जान लेते हैं कि आरक्षण है क्या??
आरक्षण का सीधे शब्दों में कहूँ तो इसका मतलब है किसी विशेष प्रकार की छूट। वर्तमान में इसे किसी विशेष समुदाय या जातियों को दिया जाता है।
बाबा साहेब ने संविधान का निर्माण किया। उन्होंने संविधान निर्माण करते हुए ये साफ लिखा है कि सब एक समान हैं कोई बड़ा या छोटा नहीं। किसी की जाती बड़ी या छोटी नही और न ही किसी का धर्म बड़ा या छोटा है।
सबको समान रूप से एक इंसान मनाने वाले बाबा साहेब कैसे किसी को जाती और धर्म के नाम पर आरक्षण देने की वकालत कर सकते थे।


बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में आरक्षण जोड़ा इसलिए कि जो पिछड़े लोग हैं और पिछड़े लोग वो जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। उन्हें सबकी तरह एक समान स्तर तक लाया जा सके और उन्हें समाज मे बराबरी पर लाने के लिए आर्थिक रूप से आरक्षण के रूप में सहायता मिले। किन्तु हुआ ऐसा नही।

आरक्षण को जातिगत फायदे के लिए और वोटों के लिए बांट दिया गया। एकसमान देश के एक जैसे लोग बँट गए जाती और धर्म में।कोई अल्पसंख्यक आरक्षण में आ गए तो कोई अनुसूचित जाति तो कोई अनुसूचित जनजाति के रूप में समाज मे बँट गए। सब एक समान हैं वाला नारा जाती और धर्मो में बंट गया।
आज आरक्षण को जाती और धर्म के आधार पर दिया जाना किसी भी आधार पर उचित नही ठहराया जा सकता है। हम सब मिलकर एक समृद्ध और विशाल भारत बनाने का सपना देखते हैं और उस सपने को साकार करने के लिए होनहार लोगो की आवश्यकता होगी परन्तु आरक्षण नाम का कीड़ा उन होनहारों के रास्ते मे दीवार बनकर बैठा है। इस बात को इस तरह समझते हैं कि किसी गरीब सामान्य वर्ग के परिवार का कोई होनहार बालक किसी प्रतिस्पर्धा में 80 प्रतिशत अंक प्राप्त करता है  और उसकी प्रतिभाग करने की शुल्क 500 रुपये तक होती है। किंतु उसको नही चुना जाता है। परंतु किसी तथाकथित जातिगत या विशेष समुदाय के संपन्न परिवार के बालक को 60 प्रतिशत लाने पर भी उस प्रतिस्पर्धा में चुन लिया जाता है और उसकी प्रतिस्पर्धा में भाग लेने का शुल्क 250 रुपये मात्र होता है।



अब जो बालक सिर्फ इसलिए नही चुना जाता है कि वो सामान्य वर्ग से है उसने मेहनत भी ज्यादा की है  शुल्क भुगतान भी  ज्यादा किया है अंक भी अधिक प्राप्त किये हैं तब सोचिये उसकी पूर्ण मेहनत करने के बाद भी असफलता हासिल होने पर उसकी मनोदशा उसे किस दिशा में ले जाएगी। इसी तरह हम कई होनहार प्रतिभाओं को खो देते हैं।
सिर्फ जातिगत और समुदायिक आरक्षण के आधार पर हम एक होनहार प्रतिभा को नही चुन पाते हैं। जबकि आर्थिक आधार पर वो उन आरक्षित लोगो से बहुत पीछे है जो तथाकथित रूप से पिछड़े हुए हैं।
मैं ये नही कहता हूं कि आरक्षण नही देना चाहिए बस ये कहना चाहता हूं की आरक्षण जाति या समुदाय को नही उन लोगो को दिया जाना चाहिए जो वाकई इसके हकदार हैं। जो आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं उन्हें उबारने के लिए आरक्षण होना चाहिए। एक देश मे सब एक समान हैं तो किसी जाति और समुदाय के लिए आरक्षण कैसे हो सकता है। उस समय जब आरक्षण को संविधान में शामिल किया गया हो सकता है उस वक़्त के हिसाब से वो सही रहा हो किन्तु  आज के वक्त में इसे किसी भी स्तर पर सही नही कह सकते हैं हमे आरक्षण नीति को वक़्त की मांग के साथ बदलना होगा और इसे जातिय और समुदायिकता से उखाड़ फ़ेंककर गरीब और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो की सही पहचान कर उन्हें मुहैया कराना होगा।
आरक्षण का प्रयोग सही तरीके से और सही लोगों के उपयोग में लाना होगा। इससे जो सम्पन्न लोग हैं और आरक्षण ( जातीय या सामुदायिक आरक्षण) का फायदा पीढ़ी दर पीढ़ी सम्पन्न होने के बाद भी उठा रहे हैं उनसे हटाकर गरीब और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो को देने से देश की दिशा और दशा दोनों में सुधार होगा। बाबा साहेब अम्बेडकर के सपने ( सब समान हों ) को साकार करना है तो जातिगत और समुदायिक आरक्षण को बदलकर आर्थिक आरक्षण की नीति में लाना होगा। एक दूरदृष्टि और सही निर्णय की सख्त आवश्यकता है अगर हम ये करने में साकार हो जाते हैं तो भारत को आगे बढ़ने या बल्कि यूँ कहें कि विश्वगुरु बनने की दिशा में बढ़ने से कोई नही रोक सकता है।
राज बिष्ट।

Thursday, November 17, 2022

पलेठी सूर्य मंदिर की किसी को सुध नहीं ख़त्म हो रही है महान विरासत



सूर्य मंदिर का नाम सुनते ही हमारे सामने कोणार्क के सूर्य मंदिर की छवि बन जाती है, पर ऐसे ही दो सूर्य मंदिर और हैं जिनमे से एक कटारमल अल्मोड़ा में स्तिथ है तथा दूसरा पलेठी टिहरी गढ़वाल में।और मैं जिस सूर्य मंदिर के बारे में लिख रहा हूँ वो है टिहरी गढ़वाल की देवप्रयाग तहसील के ब्लॉक हिंडोलाखाल से 10 किलोमीटर की दूरी पर पलेठी गांव में स्तिथ ।



यह एक प्राचीन सूर्य मंदिर। मान्यता अनुसार 7वीं-8 वीं शताब्दी की प्राचीन अवधि से संबंधित गढ़वाल में हिंडोलाखाल से 10 किमी दूर यह सूर्य मंदिर, लुलेरा गुलेरा घाटी में स्थित हैं। अगर हम स्थानीय लोगों पर विश्वास करते हैं, तो ग्रामीणों द्वारा खुदाई में मंदिरों का एक समूह मिला था। जिनमे एक यह सूर्य मंदिर तथा एक शिव मंदिर प्राप्त हुए थे। भारत मे कोणार्क और कटारमल के अलावा तीसरा सूर्य मंदिर यंही स्तिथ है। इस सूर्य मंदिर के पत्थरों पर कौन सी लिपि में लिखा गया है ये आज भी एक चर्चा और खोज का विषय है। कुछ पत्थरों पर पाया गया है कि इनपर ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है पर कुछ पर अभी स्तिथि स्पष्ट नही है भारतीय पुरातत्व विभाग के डॉ एसएन घई और डॉ के.वी. रमेश, ने 22 अक्टूबर 1968 को मंदिर के शिलालेखों का अध्ययन किया। महाराजाधिरराज परमेश्वर कल्याण वर्मन का नाम ब्रह्मी में संरचना पर एक प्रमुख उल्लेख पाया गया है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, सूर्य मंदिर 7वीं -8वीं शताब्दी के दौरान बनाए गए थे जब यह क्षेत्र ब्रह्मपुर के वरमानों के शासनकाल में था। अपने आप मे कई अनोखे राज समेटे यह सूर्य मंदिर पर्यटन और आध्यात्मिक दृष्टि से कई बड़ी संभावनाएं समेटे हुए है। इस मंदिर का डिजाइन अपने आप मे अलग और दुर्लभ है। आद्यात्मिकता और पर्यटन को साथ संजोने की दृष्टि से ये भारत की कुछ चुनिन्दा जगहों में से एक है।





पलेठी में सूर्य मंदिर इस अर्थ में विशेष हैं कि ये दक्षिण भारतीय परंपरा से अलग है। इस सूर्य मंदिर के पास में एक और मंदिर स्तिथ है जो भगवान भोलेनाथ का मंदिर है जो श्री चमनेश्वर महादेव के नाम से विख्यात है। दोनों मंदिर संस्कृतिक विरासत को संभाले हुए है किंतु सरकार और सरकारी मशीनरी के ढीले रवैये के कारण ये आज जिस जर्जर स्तिथि में है उसे गांव ही नही अपितु पूरे क्षेत्र के लोगो मे निराशा की भावना है उचित रखरखाव की कमी के कारण यह सूर्य मंदिर विलुप्त होने के कगार पर है। प्राचीन संरचनाएं जिनमें पुरातात्विक महत्व है, वे उचित रखरखावों न होने के कारण बर्बाद हो रहे हैं। आज इस मंदिर के पास में सड़क पहुंच गई है जिससे यंहा पहुंचना बहुत आसान हो गया है और इसके पुनः जीर्णोद्धार के लिए ज्यादा मेहनत की भी जरूरत नही पड़ेगी पर कोई भी सरकार या जिला प्रशासन इसकी सुध नही लेता है। अगर प्रशासन और सरकार इसपर ध्यान देते हैं तो भविष्य में हमारी इस महान धरोहर को एक बडे पर्यटन क्षेत्र के रूप में देखा जा सकता है। बस जरूरत है एक पहल की।

#राजबिष्ट


Wednesday, November 16, 2022

धर्मांतरण का कानून होगा सख्त। 10 साल की सजाI

 मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मंत्रिमंडल की बैठक बुधवार को राज्य सचिवालय में हुई।


 

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में 26 मामले सामने आए। जिसमें एक मामले को छोड़कर सभी 25 प्रस्ताव पास किए गए। 

इस दौरान धर्मांतरण का कानून सख्त करने का फैसला हुआ। अब उत्तराखंड में धर्मांतरण कानून गैर जमानती हुआ। इसमें 10 साल की सजा होगी।धामी कैबिनेट में 25 अहम प्रस्तावों पर मुहर लगी। इस दौरान नैनीताल हाईकोर्ट को शिफ्ट करने को लेकर बड़ा फैसला हुआ। बैठक में नैनीताल हाईकोर्ट को हल्द्वानी में शिफ्ट करने की सैद्धांतिक मंजूर दी गई। बता दें, नैनीताल हाईकोर्ट को शिफ्ट करने की लंबे समय से मांग चल रही थी।



धर्मांतरण का कानून होगा सख्त। 10 साल की सजा

नैनीताल हाईकोर्ट हल्द्वानी शिफ्ट करने पर सैद्धांतिक मंजूरी।

पशुपालकों को महंगे भूसे से राहत, सरकार ने सब्सिडी बढ़ाई।

भूसे और साइलेज पर बढ़ी सब्सिडी।

कौशल विकास केंद्र संचालको को भुगतान के बदले नियम।

अब तीन नहीं चार किश्तों में मिलेगा संचालकों को प्रशिक्षण का भुगतान।

सहकारिता की तर्ज पर दुग्ध विकास विभाग भी देगा 75 फीसदी सब्सिडी। अभी तक 50 फीसदी थी।

दुग्ध सहकारी समितियों से जुड़े 52 हजार पशुपालकों को मिलेगा लाभ। 

प्रयास करने वालो का भगवान भी साथ देते की हैं ।

 बहुत समय पहले की बात है , किसी गाँव में एक किसान रहता था . उसके पास बहुत सारे जानवर थे , उन्ही में से

एक गधा भी था . एक दिन वह चरते चरते खेत में बने एक पुराने सूखे हुए कुएं के पास जा पहुचा और अचानक ही उसमे फिसल कर गिर गया . गिरते ही उसने जो...र -जोर से चिल्लाना शुरू किया -” ढेंचू-ढेंचू ….ढेंचू-ढेंचू ….”

उसकी आवाज़ सुन कर खेत में काम कर रहे लोग कुएं के पास पहुचे, किसान को भी बुलाया गया .

किसान ने स्थिति का जायजा लिया , उसे गधे पर दया तो आई लेकिन उसने मन में सोचा कि इस बूढ़े गधे को बचाने से कोई लाभ नहीं है और इसमें मेहनत भी बहुत लगेगी और साथ ही कुएं की भी कोई ज़रुरत नहीं है , फिर उसने बाकी लोगों से कहा , “मुझे नहीं लगता कि हम किसी भी तरह इस गधे को बचा सकते हैं अतः आप सभी अपने-अपने काम पर लग जाइए, यहाँ समय गंवाने से कोई लाभ नहीं.”

और ऐसा कह कर वह आगे बढ़ने को ही था की एक मजदूर बोला, ” मालिक , इस गधे ने सालों तक आपकी सेवा की है , इसे इस तरह तड़प-तड़प के मरने देने से अच्छा होगा की हम उसे इसी कुएं में दफना दें .”

किसान ने भी सहमती जताते हुए उसकी हाँ में हाँ मिला दी.

” चलो हम सब मिल कर इस कुएं में मिटटी डालना शुरू करते हैं और गधे को यहीं दफना देते हैं”, किसान बोला.

गधा ये सब सुन रहा था और अब वह और भी डर गया , उसे लगा कि कहाँ उसके मालिक को उसे बचाना चाहिए तो उलटे वो लोग उसे दफनाने की योजना बना रहे हैं . यह सब सुन कर वह भयभीत हो गया , पर उसने हिम्मत नहीं हारी और भगवान् को याद कर वहां से निकलने के बारे में सोचने लगा ….

अभी वह अपने विचारों में खोया ही था कि अचानक उसके ऊपर मिटटी की बारिश होने लगी, गधे ने मन ही मन सोचा कि भले कुछ हो जाए वह अपना प्रयास नहीं छोड़ेगा और

आसानी से हार नहीं मानेगा। और फिर वह पूरी ताकत से उछाल मारने लगा .

किसान ने भी औरों की तरह मिटटी से भरी एक बोरी कुएं में झोंक दी और उसमे झाँकने लगा , उसने देखा की जैसे ही मिटटी गधे के ऊपर पड़ती वो उसे अपने शरीर से झटकता और उछल कर उसके ऊपर चढ़ जाता .जब भी उसपे मिटटी डाली जाती वह यही करता ….झटकता और ऊपर चढ़ जाता …. झटकता और ऊपर चढ़ जाता ….

किसान भी समझ चुका था कि अगर वह यूँ ही मिटटी डलवाता रहा तो गधे की जान बच सकती है .



फिर क्या था वह मिटटी डलवाता गया और देखते-देखते गधा कुएं के मुहाने तक पहुँच गया, और अंत में कूद कर बाहर आ गया.

मित्रों, हमारी ज़िन्दगी भी इसी तरह होती है , हम चाहे जितनी भी सावधानी बरतें कभी न कभी मुसीबत रुपी गड्ढे में गिर ही जाते हैं .पर गिरना प्रमुख नहीं है, प्रमुख है संभलना . बहुत से लोग बिना प्रयास किये ही हार मान लेते हैं , पर जो प्रयास करते हैं भगवान् भी किसी न किसी रूप में उनके लिए मदद भेज देता है।

Tuesday, November 15, 2022

हटाए गये विधानसभा कर्मचारियों की नहीं होगी बहाली

 विधानसभा के हटाए गए कर्मचारियों की बहाली नैनीताल हाईकोर्ट के ऑर्डर के बाद भी नहीं हो पाई है। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी ने कहा कि इन कर्मचारियों को लेकर विधिक राय ली जा रही है और उसके बाद ही इनके संदर्भ में निर्णय लिया जाएगा। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी ने 2016 के बाद विधानसभा में हुई भर्तियों को निरस्त करते हुए 250 कर्मचारियों को हटा दिया था।

कर्मचारी इस फैसले के खिलाफ कोर्ट गए तो नैनीताल हाईकोर्ट ने 15 अक्तूबर को स्पीकर के फैसले पर स्टे दे दिया। 



कर्मचारी वापस ज्वाइनिंग के लिए आए तो विधानसभा सचिवालय ने कर्मचारियों को रिसीविंग तो दी लेकिन उन्हें अग्रिम निर्देशों तक कार्यालय न आने को कह दिया।


आप अपनी राय जरूर दे



Sunday, November 13, 2022

हरचण लैगी भाषा निचन्त होण लैगी संस्कृति। (खोने लगी भाषा खत्म होने लगी संस्कृति)

  

हरचण लैगी भाषा निचन्त होण लैगी संस्कृति।

(खोने लगी भाषा खत्म होने लगी संस्कृति)

जी हाँ ये एक पंक्ति ही अपने आप मे सबकुछ कह जाती है। आज उत्तराखंड की विलुप्त होती गढ़वाली और कुमाउनी भाषा उत्तराखंड की संस्कृति को भी विलुप्ति की दिशा में ले जा रही हैं।

 किसी भी संस्कृती की पहचान वहां की भाषा, वहां की वेशभूषा होती है। गढ़वाली और कुमाउनी उत्तराखण्ड की प्रमुख बोली जाने वाली दो भाषाएँ हैं किंतु आज ये दोनों भाषाएँ विलुप्ति की दिशा में अग्रसर हैं। आज की इस भागती दौड़ती जिंदगी में रोजगार और शिक्षा के अलावा भी अन्य कई कारणों से उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन अपने चरम पर है, जिस कारण से लोगो को पहाड़ो से शहरों की तरफ भागना पड़ रहा है। लोग पहाड़ो से शहर में आकर वहीं बस जाते हैं और वहां की वेशभूषा वहां की भाषा को ही अपना लेते हैं और यहां तक कि उनके बच्चों को अपनी मूल भाषा का ज्ञान भी नही होता है। इसी कतार में कुछ लोग वो भी हैं जो दिखावटीपन के लिए भी अपनी मूल भाषा नही बोलते हैं। और कुछ लोगों को अपनी भाषा को बोलने में शर्म भी आती है। इसी तरह से गढ़वाली और कुमाउनी भाषा बोलने वालों की संख्या में हर साल कमी आ रही है और इस कमी के कारण उत्तराखण्ड की महान विरासत हमारी महान संस्कृति धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। 

पुराने वक़्त में कौथिक (थौल), सामूहिक नृत्य, सामूहिक गान इस तरह से कई अन्य आयोजन हमारी भाषा और संस्कृति को संजोकर रखते थे और लोगो के बीच मे प्रेमभाव बनाये रखने में बेजोड़ थे। किंतु आज दो गढ़वाली आपस मे गढ़वाली में और दो कुमाउनी आपस मे कुमाउनी में बात नही करते। दूसरी भाषाओं को बोलने की होड़ लगी हुई है । अपनी भाषा में बात करने में शर्म महशूश करते हैं। जबकि हमें अपनी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए।

हमारे अपने इस तरह के लोग हैं जो अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।

उनकी तुलना में कुछ लोग अभी ऐसे भी हैं जो आज भी देश या विदेशों में रहकर अपनी गढ़वाली या कुमाउनी भाषा को खुद भी बोलते हैं और अपने बच्चों को भी सिखाते हैं। यहां तक वो अपनी संस्कृति को अपने और अपने बच्चों के माध्यम से पूरे देश ही नही विदेश में भी प्रचार करते हैं।कई लोग इस दिशा में कार्य कर रहे हैं।

मेरा यह लेख किसी भी भाषा के खिलाफ नही है किंतु मैं ये कहना चाहता हूं कि आप अपने बच्चों को सब तरीके की भाषा सिखाऐं किन्तु अपनी गढवाली या कुमाउनी भाषा को सीखाना बिल्कुल न भूलें। अपनी भाषा को बचाये रखें अपनी संस्कृति बची रहेगी।

हो सके तो अपने गावों में कुछ पारम्परिक रीति रिवाजों को फिर साथ मिलकर सामूहिक रूप से मनाएं। अपनी भाषा अपनी संस्कृति के मेल मिलाप को संजोकर रखें।

क्योंकिं इतिहास गवाह है जिनकी भाषा खोई संस्कृति खोई उनका फिर नामो निशान भी मिट गया।

आप जहां भी रहें किन्तु अपनी गढवाली और कुमाउनी भाषा के साथ - साथ अपनी संस्कृति को बनाये रखें बचाये रखें। अपनी मातृभाषा को बोलने में न हिचकें और न शर्म करें। अपनी भाषा अपनी संस्कृति पर गर्व करें। आज के इस आधुनिक युग मे हमे टेक्नोलॉजी और अपनी सांस्कृतिक धरोहर अपनी भाषा को साथ लेकर चलना होगा ।

त आवा अपणी भाषा अपणी संस्कृति तैं बाचौण का खातिर आज संकल्प करदा कि अपणी भाषा बोलला और अपणी संस्कृति तै दुनिया मा फैलोला।

(तो आओ आज अपनी भाषा और संस्कृति बचाने के लिए आज संकल्प करते हैं कि अपनी भाषा बोलेंगे और अपनी अपनी संस्कृति को दुनिया तक फैलाएंगे)

#राज बिष्ट


जब रावण को मंदोदरी ने कहा राम का अवतार धारण कर लो।

 रावण सीता को समझा समझा कर

हार

गया था पर

सीता ने रावण की तरफ

एक बार देखा तक नहीं, तब

मंदोदरी ने

उपाय बताया कि तुम राम बन के

सीता के

पास जाओ वो तुम्हे जरूर देखेगी।



रावण ने कहा - मैं ऐसा कई बार कर

चुका हू

मंदोदरी - तब क्या सीता ने

आपकी ओर देखा

रावण - "मैं खुद सीता को नहीं देख

सका...क्योंकि मैं जब-जब राम बनता हूँ

मुझे

परायी नारी

अपनी माता और

अपनी पुत्री सी दिखती है

----।"

अपने अंदर राम को ढूंढे,

और उनके चरित्र पर चलिए ।

आपसे भूलकर भी

भूल नहीं होगी ।।

Friday, August 5, 2022

क्या यही है सपनो का भारत

 भारत सदियों से एक ऐसा देश रहा हैं जहाँ हर प्रकार के लोगो को समाहित करने का माद्दा है



भारत ने न कभी किसी देश पर इस उद्देश्य से आक्रमण किया की उसकी जमीन पर कब्ज़ा किया जाए और न कभी इस उद्देश्य से की किसी देश को आगे बढ़ने से रोका जाए भारत ने हमेशा से ही वसुधैव कुटुंबकम की अपनी नीति को अपनाया है और हमेशा ही उसपर कायम रहा है इतिहस गवाह है की जिसने भी यहाँ आकर यहाँ के रीति रिवाजो और यहाँ की संस्कृति को मिटाना चाहा या तो वो खुद मिट गया या फिर यहीं की संस्कृति में रम गया

भारत एक समागम का देश है जो ठीक उस फूलों के गुच्छे की तरह है जो कई तरह के फूलों को खुद में  समाये हुए है 

अपनी भिन्नताओ और अनेकता में एकता के लिए ही भारत को जाना जाता है 

 पर आज ऐसा दौर आ गया है जब हमने अपने सब नैतिक मूल्यों को खो दिया है हम इतने स्वार्थी हो गए हैं की जो हमारे स्वार्थ का कार्य न हो उसे करने के लिए हजार बार सोचते हैं चाहे वो कार्य कितना ही देशहित में  महत्वपूर्ण और आवशयक  क्यों न हो 

स्वच्छता  और समानता  का जो भाव हमारे  दिलो में होता था वो कहीं खो सा गया है एक दूसरे से निस्वार्थ मिलने की भावना कहीं बिखर के रह गयी है 

आज हम अपने आजादी के महान शहीदों को  सिर्फ स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर याद करते हैं उनकी कुर्बानियों  को भूल गये हैं 

हमने अपने सभी नैतिक मूल्यों का त्याग कर दिया है 

भारत को विकसित और संपन्न सिर्फ आर्थिक रूप से बनाना ही नहीं बल्कि उसकी जो सामाजिक समरसता है उससे भी बरकार रखना है 

जब हम अपने नैतिक मूल्यों को सही से समझ पाएंगे तब जाके ही कहीं एक समृद्ध विकसित सपनो के भारत का निर्माण हो पायेगा 

आपके कुछ विचार हों तो  कमेंट में जरूर लिखें 

राज बिष्ट  

Tuesday, July 26, 2022

जब पिप्पलाद ने शनि देव को जला दिया था

जब पिप्पलाद ने शनि देव को जला दिया था 

श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं.. इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।


एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-



नारद - बालक तुम कौन हो ?


बालक - यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।


नारद - तुम्हारे जनक कौन हैं ?


बालक - यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।


तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि -


हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।


बालक - मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?


नारद - तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।


बालक - मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?


नारद - शनिदेव की महादशा।


इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।


नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी। 


ब्रह्मा जी से वर् मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनिदेव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।



शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-


1 - जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा.. जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।


2 - मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

 

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे। अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।


सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है। आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की, जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है.. 

Monday, June 13, 2022

अजीनोमोटो: यह धीमा जहर है।

अजीनोमोटो::

सफेद रंग का चमकीला सा दिखने वाला मोनोसोडि़यम ग्लूटामेट यानी अजीनोमोटो, एक सोडियम साल्ट है। अगर आप चाइनीज़ डिश के दीवाने हैं तो यह आपको उसमें जरूर मिल जाएगा क्योंकि यह एक मसाले

के रूप में उनमें इस्तमाल किया जाता है। शायद ही आपको पता हो कि यह खाने का स्वाद बढ़ाने वाला मसाला वास्तव में जहर यह धीमा खाने का स्वाद नहीं बढ़ाता बल्कि हमारी स्वाद ग्रन्थियों के कार्य को दबा देता है जिससे हमें खाने के बुरे स्वाद का पता नहीं लगता। मूलतः इस का प्रयोग खाद्य की घटिया गुणवत्ता को छिपाने के लिए किया जाता है। यह सेहत के लिए भी बहुत खतरनाक होता है।
जान लें कि कैसे-
* सिर दर्द, पसीना आना और चक्कर आने जैसी खतरनाक बीमारी आपको अजीनोमोटो से हो सकती है। अगर आप इसके आदि हो चुके हैं और खाने में इसको बहुत प्रयोग करते हैं तो यह आपके दिमाग को भी नुकसान कर सकता है।



* इसको खाने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है। चेहरे की सूजन और त्वचा में खिंचावमहसूस होना इसके कुछ साइड इफेक्ट हो सकते हैं।
* इसका ज्यादा प्रयोग से धीरे धीरे सीने में दर्द, सांस लेने में दिक्कत और आलस भी पैदा कर सकता है। इससे सर्दी-जुखाम और थकान भी महसूस होती है। इसमें पाये जाने वाले एसिड सामग्रियों की वजह से यह पेट और गले में जलन भी पैदा कर सकता है।
* पेट के निचले भाग में दर्द, उल्टी आना और डायरिया इसके आम दुष्प्रभावों में से एक हैं।
* अजीनोमोटो आपके पैरों की मासपेशियों और घुटनों में दर्द पैदा कर सकता है। यह हड्डियों को कमज़ोर और शरीर द्वारा जितना भी कैल्शिम लिया गया हो, उसे कम कर देता है।
* उच्च रक्तचाप की समस्या से घिरे लोगों को यह बिल्कुल नहीं खाना चाहिए क्योंकि इससे अचानक ब्लड प्रेशर बढ़ और घट जाता है।
* व्यक्तियों को इससे माइग्रेन होने की समस्या भी हो सकती है। आपके सिर में दर्द पैदा हो रहा है तो उसे तुरंत ही खाना बंद कर दें।
* अजीनोमोटो की उत्पादन प्रक्रिया भी विवादास्पद है : कहा जाता है कि इसका उत्पादन जानवरों के शरीर से प्राप्त सामग्री से भी किया जा सकता है।


*अजीनोमोटो बच्चों के लिए बहुत हानिकारक है। इसके कारण स्कूल
जाने वाले ज्यादातर बच्चे सिरदर्द के शिकार हो रहे हैं। भोजन में एमएसजी का इस्तेमाल या प्रतिदिन एमएसजी युक्त जंकफूड और प्रोसेस्ड फूड का असर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है। कई शोधों में यह बात साबित हो चुकी है कि एमएसजी युक्त डाइट बच्चों में मोटापे की समस्या का एक कारण है। इसके अलावा यह बच्चों को भोजन के प्रति अंतिसंवेदनशील बना सकता है। मसलन, एमएसजी युक्त भोजन अधिक खाने के बाद हो सकता है कि बच्चे को किसी दूसरी डाइट से एलर्जी हो जाए। इसके अलावा, यह बच्चों के व्यवहार से संबंधित समस्याओं का भी एक कारण है। छिपा हो सकता है अजीनोमोटो अब पूरी दुनिया में मैगी नूडल बच्चे बड़े सभी चाव से खाते हैं, इस मैगी में जो राज की बात है वो है Hydrolyzed groundnut protein और स्वाद वर्धक 635 Disodium ribonucleotides यह कम्पनी यह दावा करती है कि इसमें अजीनोमोटो यानि MSG नहीं डाला गया है। जबकि Hydrolyzed groundnut protein पकने के बाद अजीनोमोटो यानि MSG में बदल जाता है और Disodium ribonucleotides इसमें मदद करता है।

#RajBisht

Tuesday, May 31, 2022

छोरी तेरा लारों मा

छोरी तेरा लारों मा गढ़वाली गीत १ जून २०२२ को रिलीज होने वाला है  इस गीत के गायक देव रणकोटी ने बताया की गाने के बोल संगीत और दृश्य बहुत आकर्षित करते हैं इस गीत को लिखा एवं गाया है देव रणाकोटी ने और इसे संगीत से सजाया है राहुल सैनी ने A

देव रणाकोटी ने बताया की यह गीत मनोरंजन के साथ साथ उत्तराखंड के युवाओं र कटाक्ष है जो शराब के नशे में  अपना  जीवन ठेके और बारों में बर्बाद कर रहे हैं A





इस गीत में अभिनय किया है गिरीश रणाकोटी एवं गीता राणा ने तथा कैमरा और निर्देशन राज बिष्ट ने किया है इस गीत की शूटिंग देहरादून की वादियों में हुयी है जिसमें  मालदेवता, द्वारा गाँव,  और थानों की कुछ खूबसूरत लोकेशन हैंA

राज बिष्ट और देव रणाकोटी की जोड़ी पहले भी एक सुपरहिट गीत “गौरि तेरा बिन” में साथ काम कर चुकी है इस गीत को यूट्यूब पर खूब पसंद किया गया और इसे 3 लाख से ज्यादा लोगो ने यूट्यूब पर पसंद किया हैA

इस गीत का पोस्टर देखकर लगता है की ये गीत भी यूट्यूब पर खूब धमाका करेगाA

ऐ आर फिल्म  के बैनर तले बने इस गीत से काफी उम्मीदें की जा रही हैंA

इस गीत के लिए ऐ आर फिल्म ने एक मजाकिया पोस्टर भी जारी किया हैA



 TPOINTTP की तरफ से ऐ आर फिल्म की पूरी टीम को ढेरो शुभकामनाएं A

Tuesday, December 14, 2021

सुंदरता के उपाय

 1. दूध की मलाई और बारीक पिसी हुई मिश्री को एक साथ मिलाएं और इसका सेवन नियमित रूप से करें। ऐसा करने पर कमजोरी दूर होती है और शरीर बलवान होता है। चेहरे पर रौनक बनी रहती है।



2. यदि आपकी त्वचा रूखी और बेजान दिखाई देती है तो ये नुस्खा अपनाएं। जौ का आटा, हल्दी, सरसो का तेल पानी में मिलाकर उबटन बनाएं। इस उबटन को चेहरे पर लगाएं और कुछ समय बाद साफ पानी से चेहरा धो लें। इस प्रकार नियमित रूप से करते रहे। आपका चेहरा चमकने लगेगा।



3. यदि सर्दी, खांसी और बुखार से पीड़ित हैं तो नाक में 2 बूंद सरसों का तेल डालें और दूध में हल्दी मिलाकर पिएं, इससे शीघ्र आराम मिलता है।

4. कमजोरी के दूर करने के लिए यह उपाय करें। सफेद मूसली या धोली मूसली का चूर्ण बनाएं। यह चूर्ण एक चम्मच और एक चम्मच पिसी मिश्री मिलाएं। सुबह उठने के बाद और रात को सोने से पहले गुनगुने दूध के साथ पीएं। ऐसा करने पर कमजोरी दूर हो जाती है।


5. नारियल के तेल में नींबू का रस मिलाकर बालों में लगाएं, इससे रूसी एवं खुश्की से छुटकारा मिलता है।


6. रोज सुबह नींबू और शहद को गुनगुने पानी में डालकर पीएं। इससे शरीर का अतिरिक्त फैट कम हो जाता है।


7. आंवले का मुरब्बा का सेवन नियमित रूप से करते रहेंगे तो सभी प्रकार की कमजोरी दूर हो जाएगी।


8. गैस की समस्या हो तो यह नुस्खा अपनाएं। अजवाइन और जीरा समान मात्रा में एक साथ भून लें। इसके बाद इस मिश्रण को पानी में उबाल कर छान लें और छने हुए पानी में चीनी मिलाकर पिएं। ऐसा करने पर एसिडिटी से राहत मिलती है



#राज

Saturday, December 4, 2021

चमत्कारी संत श्री नीम करोली।

चमत्कारी संत श्री नीम करोली जी महाराज जी.

 भारतभूमि कई सिद्ध आत्माओं की जन्मभूमि रही है. इसे ऋषि मुनियों की कर्म भूमि होने का सौभाग्य प्राप्त रहा है. ऐसे ही एक महान संत हुए बाबा नीब करौरी महाराज जी, जिनकी दिव्यता के मुरीद भारतभूमि से लेकर पूरे विश्व के जनमानस रहे. एप्पल कंपनी के संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग, बाबा नीब करौरी महाराज को अपनी आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बताते हुए आए हैं.

नीब करौरी महाराज जी को उनके भक्त महाराज जी के नाम से संबोधित करते हैं. महाराज जी का जन्म सन 1900 में अकबरपुर गांव, फ़िरोज़ाबाद ज़िला, उत्तरप्रदेश  के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिताजी का नाम दुर्गा प्रसाद शर्मा था.परिवार वालों ने महाराज जी का नाम लक्ष्मण दास शर्मा रखा था.


ग्यारह वर्ष की आयु में बालक लक्ष्मण दास का विवाह करा दिया गया. लेकिन उनका मन गृहस्थ जीवन में नहीं लगा और उन्होंने गृह त्याग दिया. कुछ वक़्त साधु की तरह भटकने के बाद, पिता दुर्गा प्रसाद शर्मा की विनती पर लक्ष्मण दास घर लौट आए और सांसारिक जीवन जीने लगे.


मगर नियति में आध्यात्मिक संसार और जीवन लिखा था. सन 1958 में महाराज जी ने सांसारिक जीवन त्याग दिया.उन्होंने पूरे उत्तर भारत की यात्रा की। यहां एक रोचक प्रसंग मिलता है. जब महाराज जी अपने गांव से उत्तर भारत की यात्रा पर निकले तो टिकट कलेक्टर ने उन्हें फर्रुखाबाद जनपद के गांव नीब करौरी के निकट ट्रेन से उतार दिया. महाराज जी के पास ट्रेन का टिकट नहीं था। महाराज जी उतर गए. मगर फिर ट्रेन नहीं चल सकी. यात्रियों ने टीसी से कहा कि यह एक महान संत हैं और इनकी आज्ञा के बिना अब यह ट्रेन नहीं चलने वाली. टीसी ने तब महाराज जी से क्षमा याचना की और ट्रेन को चलने की आज्ञा देने की विनती की. इस पर महाराज जी ने दो शर्त रखी. पहली यह कि नीब करौरी को एक रेलवे स्टेशन घोषित किया जाए.और आगे से साधु महात्माओं से अच्छी तरह से पेश आया जाए. रेलवे अधिकारियों ने दोनों शर्त मान ली और फिर ट्रेन चल पड़ी. 



अपनी यात्राओं के दौरान महाराज जी अलग अलग स्थानों पर रुकते. उनके अलग अलग नाम रखे गए. भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार उनको पुकारता.महाराज जी प्रभु श्री राम और हनुमान जी की भक्ति करते थे. अपने भक्तो को हनुमान चालीसा पढ़ने की सलाह देते थे.गुजरात में तपस्या करने के बाद महाराज जी ने अपने दो आश्रम स्थापित किए. फर्रुखाबाद और कैंची में.यह दोनों आश्रम विदेशियों के आकर्षण का केंद्र बने.हिप्पी आंदोलन के दौरान जो विदेशी भारत भूमि अाए, वह महाराज जी के संपर्क में आने पर उनके अनन्य भक्त बन गए.राम दास, कृष्ण दास उनके विदेशी भक्तो के नाम थे, जिनका नामकरण महाराज जी ने स्वयं किया. 


महाराज जी ने सन 1964 में कैंची, उत्तराखंड में अपने आध्यात्मिक धाम की स्थापना की. अपने जीवन के अंतिम दस वर्ष महाराज जी कैंची धाम में रहे.कैंची धाम विश्व विख्यात स्थल है. यहां हर वर्ष 15 जून को विशाल भंडारा होता है, जहां एक दिन में तक़रीबन एक साल से अधिक लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं.


महाराज जी की कुछ बहुत साफ़, सीधी, सटीक बातें थीं. सभी से प्रेम करो, ईश्वर का स्मरण करो, भूखों को भोजन कराओ, सभी के साथ सेवा भाव रखो.


11 सितंबर 1973 को वृंदावन के एक अस्पताल में महाराज जी ने अपने भौतिक शरीर का त्याग कर दिया. वृंदावन में ही उनका समाधि स्थल है. आज महाराज जी के करोड़ों भक्त पूरी दुनिया में सेवा और प्रेम का संदेश दे रहे हैं. यही सच्ची प्रार्थना है.


#राज बिष्ट

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