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Wednesday, November 16, 2022

प्रयास करने वालो का भगवान भी साथ देते की हैं ।

 बहुत समय पहले की बात है , किसी गाँव में एक किसान रहता था . उसके पास बहुत सारे जानवर थे , उन्ही में से

एक गधा भी था . एक दिन वह चरते चरते खेत में बने एक पुराने सूखे हुए कुएं के पास जा पहुचा और अचानक ही उसमे फिसल कर गिर गया . गिरते ही उसने जो...र -जोर से चिल्लाना शुरू किया -” ढेंचू-ढेंचू ….ढेंचू-ढेंचू ….”

उसकी आवाज़ सुन कर खेत में काम कर रहे लोग कुएं के पास पहुचे, किसान को भी बुलाया गया .

किसान ने स्थिति का जायजा लिया , उसे गधे पर दया तो आई लेकिन उसने मन में सोचा कि इस बूढ़े गधे को बचाने से कोई लाभ नहीं है और इसमें मेहनत भी बहुत लगेगी और साथ ही कुएं की भी कोई ज़रुरत नहीं है , फिर उसने बाकी लोगों से कहा , “मुझे नहीं लगता कि हम किसी भी तरह इस गधे को बचा सकते हैं अतः आप सभी अपने-अपने काम पर लग जाइए, यहाँ समय गंवाने से कोई लाभ नहीं.”

और ऐसा कह कर वह आगे बढ़ने को ही था की एक मजदूर बोला, ” मालिक , इस गधे ने सालों तक आपकी सेवा की है , इसे इस तरह तड़प-तड़प के मरने देने से अच्छा होगा की हम उसे इसी कुएं में दफना दें .”

किसान ने भी सहमती जताते हुए उसकी हाँ में हाँ मिला दी.

” चलो हम सब मिल कर इस कुएं में मिटटी डालना शुरू करते हैं और गधे को यहीं दफना देते हैं”, किसान बोला.

गधा ये सब सुन रहा था और अब वह और भी डर गया , उसे लगा कि कहाँ उसके मालिक को उसे बचाना चाहिए तो उलटे वो लोग उसे दफनाने की योजना बना रहे हैं . यह सब सुन कर वह भयभीत हो गया , पर उसने हिम्मत नहीं हारी और भगवान् को याद कर वहां से निकलने के बारे में सोचने लगा ….

अभी वह अपने विचारों में खोया ही था कि अचानक उसके ऊपर मिटटी की बारिश होने लगी, गधे ने मन ही मन सोचा कि भले कुछ हो जाए वह अपना प्रयास नहीं छोड़ेगा और

आसानी से हार नहीं मानेगा। और फिर वह पूरी ताकत से उछाल मारने लगा .

किसान ने भी औरों की तरह मिटटी से भरी एक बोरी कुएं में झोंक दी और उसमे झाँकने लगा , उसने देखा की जैसे ही मिटटी गधे के ऊपर पड़ती वो उसे अपने शरीर से झटकता और उछल कर उसके ऊपर चढ़ जाता .जब भी उसपे मिटटी डाली जाती वह यही करता ….झटकता और ऊपर चढ़ जाता …. झटकता और ऊपर चढ़ जाता ….

किसान भी समझ चुका था कि अगर वह यूँ ही मिटटी डलवाता रहा तो गधे की जान बच सकती है .



फिर क्या था वह मिटटी डलवाता गया और देखते-देखते गधा कुएं के मुहाने तक पहुँच गया, और अंत में कूद कर बाहर आ गया.

मित्रों, हमारी ज़िन्दगी भी इसी तरह होती है , हम चाहे जितनी भी सावधानी बरतें कभी न कभी मुसीबत रुपी गड्ढे में गिर ही जाते हैं .पर गिरना प्रमुख नहीं है, प्रमुख है संभलना . बहुत से लोग बिना प्रयास किये ही हार मान लेते हैं , पर जो प्रयास करते हैं भगवान् भी किसी न किसी रूप में उनके लिए मदद भेज देता है।

Tuesday, November 15, 2022

हटाए गये विधानसभा कर्मचारियों की नहीं होगी बहाली

 विधानसभा के हटाए गए कर्मचारियों की बहाली नैनीताल हाईकोर्ट के ऑर्डर के बाद भी नहीं हो पाई है। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी ने कहा कि इन कर्मचारियों को लेकर विधिक राय ली जा रही है और उसके बाद ही इनके संदर्भ में निर्णय लिया जाएगा। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी ने 2016 के बाद विधानसभा में हुई भर्तियों को निरस्त करते हुए 250 कर्मचारियों को हटा दिया था।

कर्मचारी इस फैसले के खिलाफ कोर्ट गए तो नैनीताल हाईकोर्ट ने 15 अक्तूबर को स्पीकर के फैसले पर स्टे दे दिया। 



कर्मचारी वापस ज्वाइनिंग के लिए आए तो विधानसभा सचिवालय ने कर्मचारियों को रिसीविंग तो दी लेकिन उन्हें अग्रिम निर्देशों तक कार्यालय न आने को कह दिया।


आप अपनी राय जरूर दे



Sunday, November 13, 2022

हरचण लैगी भाषा निचन्त होण लैगी संस्कृति। (खोने लगी भाषा खत्म होने लगी संस्कृति)

  

हरचण लैगी भाषा निचन्त होण लैगी संस्कृति।

(खोने लगी भाषा खत्म होने लगी संस्कृति)

जी हाँ ये एक पंक्ति ही अपने आप मे सबकुछ कह जाती है। आज उत्तराखंड की विलुप्त होती गढ़वाली और कुमाउनी भाषा उत्तराखंड की संस्कृति को भी विलुप्ति की दिशा में ले जा रही हैं।

 किसी भी संस्कृती की पहचान वहां की भाषा, वहां की वेशभूषा होती है। गढ़वाली और कुमाउनी उत्तराखण्ड की प्रमुख बोली जाने वाली दो भाषाएँ हैं किंतु आज ये दोनों भाषाएँ विलुप्ति की दिशा में अग्रसर हैं। आज की इस भागती दौड़ती जिंदगी में रोजगार और शिक्षा के अलावा भी अन्य कई कारणों से उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन अपने चरम पर है, जिस कारण से लोगो को पहाड़ो से शहरों की तरफ भागना पड़ रहा है। लोग पहाड़ो से शहर में आकर वहीं बस जाते हैं और वहां की वेशभूषा वहां की भाषा को ही अपना लेते हैं और यहां तक कि उनके बच्चों को अपनी मूल भाषा का ज्ञान भी नही होता है। इसी कतार में कुछ लोग वो भी हैं जो दिखावटीपन के लिए भी अपनी मूल भाषा नही बोलते हैं। और कुछ लोगों को अपनी भाषा को बोलने में शर्म भी आती है। इसी तरह से गढ़वाली और कुमाउनी भाषा बोलने वालों की संख्या में हर साल कमी आ रही है और इस कमी के कारण उत्तराखण्ड की महान विरासत हमारी महान संस्कृति धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। 

पुराने वक़्त में कौथिक (थौल), सामूहिक नृत्य, सामूहिक गान इस तरह से कई अन्य आयोजन हमारी भाषा और संस्कृति को संजोकर रखते थे और लोगो के बीच मे प्रेमभाव बनाये रखने में बेजोड़ थे। किंतु आज दो गढ़वाली आपस मे गढ़वाली में और दो कुमाउनी आपस मे कुमाउनी में बात नही करते। दूसरी भाषाओं को बोलने की होड़ लगी हुई है । अपनी भाषा में बात करने में शर्म महशूश करते हैं। जबकि हमें अपनी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए।

हमारे अपने इस तरह के लोग हैं जो अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।

उनकी तुलना में कुछ लोग अभी ऐसे भी हैं जो आज भी देश या विदेशों में रहकर अपनी गढ़वाली या कुमाउनी भाषा को खुद भी बोलते हैं और अपने बच्चों को भी सिखाते हैं। यहां तक वो अपनी संस्कृति को अपने और अपने बच्चों के माध्यम से पूरे देश ही नही विदेश में भी प्रचार करते हैं।कई लोग इस दिशा में कार्य कर रहे हैं।

मेरा यह लेख किसी भी भाषा के खिलाफ नही है किंतु मैं ये कहना चाहता हूं कि आप अपने बच्चों को सब तरीके की भाषा सिखाऐं किन्तु अपनी गढवाली या कुमाउनी भाषा को सीखाना बिल्कुल न भूलें। अपनी भाषा को बचाये रखें अपनी संस्कृति बची रहेगी।

हो सके तो अपने गावों में कुछ पारम्परिक रीति रिवाजों को फिर साथ मिलकर सामूहिक रूप से मनाएं। अपनी भाषा अपनी संस्कृति के मेल मिलाप को संजोकर रखें।

क्योंकिं इतिहास गवाह है जिनकी भाषा खोई संस्कृति खोई उनका फिर नामो निशान भी मिट गया।

आप जहां भी रहें किन्तु अपनी गढवाली और कुमाउनी भाषा के साथ - साथ अपनी संस्कृति को बनाये रखें बचाये रखें। अपनी मातृभाषा को बोलने में न हिचकें और न शर्म करें। अपनी भाषा अपनी संस्कृति पर गर्व करें। आज के इस आधुनिक युग मे हमे टेक्नोलॉजी और अपनी सांस्कृतिक धरोहर अपनी भाषा को साथ लेकर चलना होगा ।

त आवा अपणी भाषा अपणी संस्कृति तैं बाचौण का खातिर आज संकल्प करदा कि अपणी भाषा बोलला और अपणी संस्कृति तै दुनिया मा फैलोला।

(तो आओ आज अपनी भाषा और संस्कृति बचाने के लिए आज संकल्प करते हैं कि अपनी भाषा बोलेंगे और अपनी अपनी संस्कृति को दुनिया तक फैलाएंगे)

#राज बिष्ट


जब रावण को मंदोदरी ने कहा राम का अवतार धारण कर लो।

 रावण सीता को समझा समझा कर

हार

गया था पर

सीता ने रावण की तरफ

एक बार देखा तक नहीं, तब

मंदोदरी ने

उपाय बताया कि तुम राम बन के

सीता के

पास जाओ वो तुम्हे जरूर देखेगी।



रावण ने कहा - मैं ऐसा कई बार कर

चुका हू

मंदोदरी - तब क्या सीता ने

आपकी ओर देखा

रावण - "मैं खुद सीता को नहीं देख

सका...क्योंकि मैं जब-जब राम बनता हूँ

मुझे

परायी नारी

अपनी माता और

अपनी पुत्री सी दिखती है

----।"

अपने अंदर राम को ढूंढे,

और उनके चरित्र पर चलिए ।

आपसे भूलकर भी

भूल नहीं होगी ।।

Friday, July 23, 2021

एक प्रेम कहानी ऐसी भी!

एक लड़का और एक लड़की  आपस मे बहुत प्यार करते थे,

पर हालातों की वजह से लड़की की शादी किसी और

से हो जाती है,



बरसों बाद वो एक दूसरे को मिलते हैं तो

लड़के ने कहा-

तेरी मोहब्बत में बीता हर एक पल आज

भी मुझे याद  आता है,

मैंने तो तुझे भूलना चाहा पर ये दिल भूल

ना पाता है।


वो मेरे कंधे पे सर रखकर तेरे हँसना याद आता है,

वो मेरे गले लगकर घंटो तेरा रोना याद आता है।

वो घंटो मेरे सीने पे सर रख कर तेरा सोना याद आता है,


वो मुझपे तेरा हक़ जाताना बेमतलब लड़ जाना याद आता है।

वो रूठना और मनाना तेरा दिल को बहुत याद आता है,


यूँ तो कोई कमी नहीं जीवन में 

फिर भी न जाने क्यों खुशी का साया भी नजऱ ना आता है।

सब कुछ है पास मेरे पर, प्यार का कतरा भी नजर ना आता है।

लड़की बोली-

तनहा तो मै भी हूँ तेरे बिन पर किसी से कुछ ना कहती हूँ,

औरों की इज़्ज़त की खातिर सब कुछ घुट घुट कर सहती हूँ।

ऐसा एक दिन ना जाता ज़ब मैं ख़ुद से ये ना कहतीं हूँ।

मेरा प्यार तो बस एक तू था तू मेरे दिल में रहता है मैं तेरे दिल में रहती हूँ।

तेरी तस्वीरो से मै अब भी बाते करती रहती हूँ,

जब दर्द हद से बढ़ जाता है तो घंटो रोती रहतीं हूँ।

बस घरवालो की इज़्ज़त की खातिर मैंने ये कदम उठाया था,

पर क्या हासिल हुआ चार ज़िंदगियां तबाह करके

मैं अक्सर सोचती रहती हूँ।

ना तू खुश है ना मैं ख़ुश हूँ ना वों ख़ुश जिन्हें हमने अपनाया है,

ये कैसा मिलन है और कैसा है ये बन्धन मैं अक़्सर यही

सोचती रहती हूँ।

Love

#राजबिष्ट


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