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Friday, March 15, 2024

उत्तराखण्ड की सड़को से जल्द हटेंगे पुराने विक्रम और सिटी बसें।

उत्तराखण्ड: प्रदेश भर के शहरों में बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए डीजल से चलने वाले पुराने विक्रम और सिटी बसें हटाईं जाएंगी। इसके लिए कैबिनेट ने उत्तराखंड स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति-2024 को मंजूरी दे दी। इस नीति के तहत पुराने वाहन को स्क्रैब करने और नए सीएनजी वाहन खरीदने पर सरकार 40 से 50 प्रतिशत तक सब्सिडी देगी। इसके अलावा वन पंचायतों में रह रहे 25 लाख लोगों को आजीविका से जोड़ने के लिए अधिकार दिए गए।

बृहस्पतिवार को सचिवालय में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। जिसमें आठ प्रस्तावों पर फैसला लिया गया। सचिव शैलेष बगौली ने कैबिनेट के निर्णयों की जानकारी देते हुए बताया कि शहरों में डीजल से संचालित पुराने वाहनों से बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए उत्तराखंड स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति 2024 को मंजूरी दी गई। इसके तहत देहरादून शहर से पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाएगा। जिसमें पुराने सिटी बस व विक्रम को स्क्रैब नहींं कराने वालों को पर्यावरण फ्रेंडली इलेक्ट्रिक व सीएनजी वाहन (25 से 32 सीटर) खरीदने के लिए कुल लागत का 40 प्रतिशत या अधिकतम 12 लाख तक सब्सिडी दी जाएगी। जबकि वाहन स्क्रैब का प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने पर नए वाहन खरीदने के लिए 50 प्रतिशत या अधिकतम 15 लाख रुपये की सब्सिडी दी जाएगी।


अन्य लिए गये फैसले इस प्रकार हैं-:

— उत्तराखंड संस्कृत शिक्षा नियमावली को मंजूरी।

— कार्मिक विभाग के अंतर्गत ज्येष्ठता नियमावली में संशोधन को मंजूरी। एक चयन के स्थान पर एक चयन वर्ष को मंजूरी।

— वन पंचायत संशोधन नियमावली को मंजूरी। इको टूरिज्म आदि को दिया जाएगा बढ़ावा।

— शहरी विकास विभाग के अंतर्गत हरिद्वार में यूनिटी मॉल के निर्माण को 0.9 हेक्टेयर भूमि हरिद्वार विकास प्राधिकरण को होगी हस्तांतरित।

— न्याय विभाग के अंतर्गत बागेश्वर, चम्पावत, चमोली, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी में कुटुंब न्यायालयों में 18 पदों को मंजूरी।

— न्याय विभाग के अंतर्गत देहरादून, हरिद्वार व रुड़की में पारिवारिक न्यायालयों की स्थापना होगी। इसके लिए नौ पदों को मंजूरी।

— आदि कैलाश पैदल यात्रा को प्रोत्साहित किए जाने व इस क्षेत्र में होम स्टे को बढ़ावा दिए जाने का निर्णय लिया गया।


Sunday, March 3, 2024

ऐतिहासिक चांदपुर गढ़ी एक बेहतरीन पर्यटन स्थल

चांदपुर गढ़ी किला उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है । चांदपुर गढ़ी किला कर्णप्रयाग और गैरसैंण के बीच स्थित है। अटागढ़ नदी के किनारे एक टीले पर स्थित चांदपुर गढ़ी किला, पंवार शासकों और गढ़वाल की कहानी कहता है। यह चांदपुर गढ़ी किला एक ऐतिहासिक पर्यटक आकर्षण है जो चमोली की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच स्थित है।

गढ़वाल के इतिहास की शुरुआत कत्यूरी राजाओं से मानी जाती है। कत्यूरी राजाओं ने 10वीं शताब्दी तक जोशीमठ में शासन किया और फिर 11वीं शताब्दी के आसपास अपनी राजधानी को अल्मोडा में स्थानांतरित कर दिया। जब कत्यूरी राजाओं ने गढ़वाल छोड़ कर अल्मोड़ा को अपनी राजधानी बनाया तो यहां कई छोटे-छोटे किले उभरे, जिनमें चांदपुर गढ़ी प्रमुख था।

चांदपुर गढ़ी को बहुत शक्तिशाली गढ़ माना गया है। यहां मिले प्राचीन अभिलेखों और पुरातत्व विभाग के साक्ष्यों से प्राप्त जानकारी के आधार पर कहा जाता है कि राजा कनक पाल , जो गढ़वाल के एक शक्तिशाली राजा थे, संवत में मालवा (जो आधुनिक मध्य प्रदेश में है) से गढ़वाल आए थे। 755 ई. में स्वयं को राजा सोनपाल का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। राजा कनकपाल ने चांदपुर गढ़ी को अपनी राजधानी के रूप में स्थापित किया।

चांदपुर गढ़ी के इतिहास को लेकर इतिहासकार एक मत नहीं हैं। इतिहासकार अभी तक यह स्पष्ट रूप से नहीं बता पाए हैं कि चांदपुर गढ़ी वास्तव में कब राजधानी बनी। कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है कि कनक पाल 699 में मालवा की धारा नगरी से यहाँ आये थे और कुछ का मानना ​​है कि वे गुर्जर देश (आधुनिक गुजरात) से आये थे।

चांदपुर गढ़ी किले का इतिहास करीब 1300 साल पुराना है। ऐसा माना जाता है कि 8वीं-9वीं शताब्दी में गढ़वाल क्षेत्र कई छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था। उसी समय चांदपुर गढ़ी में भानु प्रताप नामक शासक राज्य करता था। उन्होंने अपनी बेटी का विवाह कनक पाल नामक राजकुमार से तय किया, जो गुजरात के धारानगर से आया था और फिर चांदपुर का राज्य कनक पाल को दे दिया। इन्हीं कनक पाल ने गढ़वाल में पँवार वंश की स्थापना की। गढ़वाल का अर्थ है 52 किलों का समूह। उत्तराखंड में बावन किले हैं। उन्हीं किलों में से एक है चांदपुर गढ़ी किला।

पँवार वंश के अंतिम राजा राजा अजय पाल थे। 37वें राजा अजय पाल ने यहां के 52 गढ़ों को समेकित किया और बाद में इस क्षेत्र का नाम गढ़वाल रखा। यहीं से राजा अजय पाल ने गढ़वाल पर अपना शासन कार्य किया था। राजा अजय पाल ने बाद में अपनी राजधानी चांदपुर गढ़ी से बदलकर देवलगढ़ कर ली और उसके बाद राजधानी देवलगढ़ से बदलकर श्रीनगर कर दी गई, क्योंकि उस समय लगातार बाहरी हमले हो रहे थे, जिसके कारण राजा अजय पाल ने अपने राज्य को सुरक्षित रखने के लिए ऐसा निर्णय लिया। देवलगढ़ वर्तमान समय में पौडी जिले में स्थित है।

चांदपुर गढ़ी पूरा वीडियो यूट्यूब पर यहाँ देखें 👇👇👇

कृपया लिंक पर क्लिक करें👇👇👇

https://youtu.be/z74qZb_7JqU

Raj B Entertainment

Friday, November 18, 2022

देश को कैसे खा रहा है आरक्षण रुपी दानव

 आरक्षण ?? इस शब्द को सुनते ही दो तरह के लोगो के चेहरे सामने उरने लगते हैं। एक वो जो कहते हैं आरक्षण का होना  सही नही है और दूसरे वो जो कहते हैं आरक्षण का होना सही है। आज का आरक्षण  दो धारी तलवार की तरह है । और इस वक़्त हम जिस धार का प्रयोग कर रहे हैं वो पूर्ण  से नुकसान देने वाली है। सही धार पकड़ने के लिए आईये इसे समझते हैं।

पहले ये जान लेते हैं कि आरक्षण है क्या??
आरक्षण का सीधे शब्दों में कहूँ तो इसका मतलब है किसी विशेष प्रकार की छूट। वर्तमान में इसे किसी विशेष समुदाय या जातियों को दिया जाता है।
बाबा साहेब ने संविधान का निर्माण किया। उन्होंने संविधान निर्माण करते हुए ये साफ लिखा है कि सब एक समान हैं कोई बड़ा या छोटा नहीं। किसी की जाती बड़ी या छोटी नही और न ही किसी का धर्म बड़ा या छोटा है।
सबको समान रूप से एक इंसान मनाने वाले बाबा साहेब कैसे किसी को जाती और धर्म के नाम पर आरक्षण देने की वकालत कर सकते थे।


बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में आरक्षण जोड़ा इसलिए कि जो पिछड़े लोग हैं और पिछड़े लोग वो जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। उन्हें सबकी तरह एक समान स्तर तक लाया जा सके और उन्हें समाज मे बराबरी पर लाने के लिए आर्थिक रूप से आरक्षण के रूप में सहायता मिले। किन्तु हुआ ऐसा नही।

आरक्षण को जातिगत फायदे के लिए और वोटों के लिए बांट दिया गया। एकसमान देश के एक जैसे लोग बँट गए जाती और धर्म में।कोई अल्पसंख्यक आरक्षण में आ गए तो कोई अनुसूचित जाति तो कोई अनुसूचित जनजाति के रूप में समाज मे बँट गए। सब एक समान हैं वाला नारा जाती और धर्मो में बंट गया।
आज आरक्षण को जाती और धर्म के आधार पर दिया जाना किसी भी आधार पर उचित नही ठहराया जा सकता है। हम सब मिलकर एक समृद्ध और विशाल भारत बनाने का सपना देखते हैं और उस सपने को साकार करने के लिए होनहार लोगो की आवश्यकता होगी परन्तु आरक्षण नाम का कीड़ा उन होनहारों के रास्ते मे दीवार बनकर बैठा है। इस बात को इस तरह समझते हैं कि किसी गरीब सामान्य वर्ग के परिवार का कोई होनहार बालक किसी प्रतिस्पर्धा में 80 प्रतिशत अंक प्राप्त करता है  और उसकी प्रतिभाग करने की शुल्क 500 रुपये तक होती है। किंतु उसको नही चुना जाता है। परंतु किसी तथाकथित जातिगत या विशेष समुदाय के संपन्न परिवार के बालक को 60 प्रतिशत लाने पर भी उस प्रतिस्पर्धा में चुन लिया जाता है और उसकी प्रतिस्पर्धा में भाग लेने का शुल्क 250 रुपये मात्र होता है।



अब जो बालक सिर्फ इसलिए नही चुना जाता है कि वो सामान्य वर्ग से है उसने मेहनत भी ज्यादा की है  शुल्क भुगतान भी  ज्यादा किया है अंक भी अधिक प्राप्त किये हैं तब सोचिये उसकी पूर्ण मेहनत करने के बाद भी असफलता हासिल होने पर उसकी मनोदशा उसे किस दिशा में ले जाएगी। इसी तरह हम कई होनहार प्रतिभाओं को खो देते हैं।
सिर्फ जातिगत और समुदायिक आरक्षण के आधार पर हम एक होनहार प्रतिभा को नही चुन पाते हैं। जबकि आर्थिक आधार पर वो उन आरक्षित लोगो से बहुत पीछे है जो तथाकथित रूप से पिछड़े हुए हैं।
मैं ये नही कहता हूं कि आरक्षण नही देना चाहिए बस ये कहना चाहता हूं की आरक्षण जाति या समुदाय को नही उन लोगो को दिया जाना चाहिए जो वाकई इसके हकदार हैं। जो आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं उन्हें उबारने के लिए आरक्षण होना चाहिए। एक देश मे सब एक समान हैं तो किसी जाति और समुदाय के लिए आरक्षण कैसे हो सकता है। उस समय जब आरक्षण को संविधान में शामिल किया गया हो सकता है उस वक़्त के हिसाब से वो सही रहा हो किन्तु  आज के वक्त में इसे किसी भी स्तर पर सही नही कह सकते हैं हमे आरक्षण नीति को वक़्त की मांग के साथ बदलना होगा और इसे जातिय और समुदायिकता से उखाड़ फ़ेंककर गरीब और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो की सही पहचान कर उन्हें मुहैया कराना होगा।
आरक्षण का प्रयोग सही तरीके से और सही लोगों के उपयोग में लाना होगा। इससे जो सम्पन्न लोग हैं और आरक्षण ( जातीय या सामुदायिक आरक्षण) का फायदा पीढ़ी दर पीढ़ी सम्पन्न होने के बाद भी उठा रहे हैं उनसे हटाकर गरीब और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो को देने से देश की दिशा और दशा दोनों में सुधार होगा। बाबा साहेब अम्बेडकर के सपने ( सब समान हों ) को साकार करना है तो जातिगत और समुदायिक आरक्षण को बदलकर आर्थिक आरक्षण की नीति में लाना होगा। एक दूरदृष्टि और सही निर्णय की सख्त आवश्यकता है अगर हम ये करने में साकार हो जाते हैं तो भारत को आगे बढ़ने या बल्कि यूँ कहें कि विश्वगुरु बनने की दिशा में बढ़ने से कोई नही रोक सकता है।
राज बिष्ट।

Thursday, November 17, 2022

बंदीरक्षक के 238 पदों पर भर्ती जल्द करें आवेदन

 

उत्तराखंड लोक सेवा आयोग ने कारागार विभाग में बंदीरक्षक के 238 पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी कर दिया है। इसके लिए 15 नवंबर से पांच दिसंबर तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। उम्मीदवारों को चयन के लिए पहले शारीरिक दक्षता परीक्षा और फिर लिखित परीक्षा देनी होगी। 

आयोग के सचिव जीएस रावत के मुताबिक, जेल बंदीरक्षक के 214 और महिला जेल बंदीरक्षक के 24 पदों पर भर्ती की जाएगी। उन्होंने बताया कि जेल बंदीरक्षक के पदों के लिए केवल पुरुष उम्मीदवार ही आवेदन कर सकते हैं। इन पदों पर भर्ती के लिए आवेदक का किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से 12वीं पास होना जरूरी है।उसे देवनागरी लिपि में हिंदी का ज्ञान भी होना चाहिए। 

अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने बंदीरक्षक भर्ती के लिए 28 जून 2021 को विज्ञापन जारी किया था। उसमें पुरुष बंदीरक्षक के 200 और महिला बंदीरक्षक के 13 पद थे। 

अब उत्तराखंड लोक सेवा आयोग ने जो विज्ञापन जारी किया है, उसमें पुरुष बंदीरक्षक के 214 और महिला बंदीरक्षक के 24 पद हो गए हैं। पुरुष उम्मीदवारों के लिए पर्वतीय क्षेत्र को छोड़कर सामान्य, पिछड़ी एससी उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम ऊंचाई 165 सेमी और पर्वतीय क्षेत्र के उम्मीदवारों के लिए 160 सेमी होनी चाहिए। अनुसूचित जनजाति उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम ऊंचाई 157.5 सेमी है। वहीं

महिला बंदीरक्षक उम्मीदवारों के लिए पर्वतीय क्षेत्र को छोड़कर जनरल, ओबीसी उम्मीदवारों के लिए कम से कम 152 सेमी और एससी, एसटी उम्मीदवारों के लिए 147 सेमी ऊंचाई होनी चाहिए। उम्मीदवारों के लिए आयु 21 से 35 वर्ष होनी चाहिए। जिन उम्मीदवारों ने अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की ओर से निकाली गई बंदीरक्षक भर्ती में आवेदन किया था, उनकी आयु की गणना एक जुलाई 2020 के आधार पर और नए उम्मीदवारों की आयु की गणना एक जुलाई 2022 के आधार पर की जाएगी। आवेदन के शुल्क में छूट दी गई है।

Apply Here for post - https://ukpsc.net.in 

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