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Saturday, November 19, 2022

इस गाँव जाने के बाद कभी नहीं आती गरीबी

 आपने दुनिया की कई अनोखी जगह के बारे में तो सुना होगा उन्हीं अनोखी जगह में से एक जगह है उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित माणा गांव । माणा गांव को भारत का अंतिम गांव भी कहा जाता है कहा जाता है कि जो भी यहां जाता है उसकी गरीबी हमेशा के लिए दूर हो जाती है और इसके पीछे की कई घटनाओं का जिक्र यहां पर किया जाता है  माना जाता है कि यह गांव शाप मुक्त है और भगवान शिव की यहां पर असीम कृपा सब पर बनी रहती है जो भी इस गांव में जाता है उस पर शिव की कृपा बनी रहती है और इस गांव में जाने से आदमी की दरिद्रता हमेशा के लिए दूर हो जाती है  यहां जाने से यह भी मान्यता है कि पाप मिट जाते हैं और भगवान शिव की कृपा उसको प्रदान होती है

 यह गांव प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ एक अनोखा गांव भी है

 माना जाता है कि कई वर्षों पूर्व भारत और तिब्बत के बीच व्यापार यहीं से होता था उसी में एक व्यापारी था जिसका नाम माणिक शाह था माणिक  एक दिन व्यापार करने के लिए तिब्बत जा रहा था तो रास्ते में कुछ लुटेरों ने उसे रोककर उसकी गर्दन काट दी गर्दन काटने  के बाद भी उसके मुंह से शिव के लिए ही प्रार्थना निकल रही थी यह देखकर भगवान शिव बहुत खुश हुए और उसे वराह का सिर लगाकर वहां पर जीवित कर दिया तब से वहां पर माणिक भद्र की पूजा की जाती है भगवान शिव ने माणिक भद्र को वरदान दिया कि जब भी कोई यहां पर आए  और पूजा करे तो तुम उनकी दरिद्रता दूर करोगे।

 एक और मान्यता के अनुसार यह भी माना जाता है कि  भगवान श्री गणेश के कहने पर वेदव्यास जी ने यहीं पर महाभारत की रचना की थी और महाभारत के युद्ध के समापन के बाद पांडव द्रोपदी समेत यही से स्वर्ग के लिए गए थे तो कहां जाता है कि यहीं से स्वर्ग की सीड़ियों का  प्रारंभ होता है

उत्तराखण्ड  को यूँ ही  नहीं देवों  कि भूमि कहा जाता है।

एक बार जरूर इस गांव  को जाएँ क्या पता वहां से आपकी किस्मत बदल जाये।


#राज् बिष्ट







Friday, November 18, 2022

देश को कैसे खा रहा है आरक्षण रुपी दानव

 आरक्षण ?? इस शब्द को सुनते ही दो तरह के लोगो के चेहरे सामने उरने लगते हैं। एक वो जो कहते हैं आरक्षण का होना  सही नही है और दूसरे वो जो कहते हैं आरक्षण का होना सही है। आज का आरक्षण  दो धारी तलवार की तरह है । और इस वक़्त हम जिस धार का प्रयोग कर रहे हैं वो पूर्ण  से नुकसान देने वाली है। सही धार पकड़ने के लिए आईये इसे समझते हैं।

पहले ये जान लेते हैं कि आरक्षण है क्या??
आरक्षण का सीधे शब्दों में कहूँ तो इसका मतलब है किसी विशेष प्रकार की छूट। वर्तमान में इसे किसी विशेष समुदाय या जातियों को दिया जाता है।
बाबा साहेब ने संविधान का निर्माण किया। उन्होंने संविधान निर्माण करते हुए ये साफ लिखा है कि सब एक समान हैं कोई बड़ा या छोटा नहीं। किसी की जाती बड़ी या छोटी नही और न ही किसी का धर्म बड़ा या छोटा है।
सबको समान रूप से एक इंसान मनाने वाले बाबा साहेब कैसे किसी को जाती और धर्म के नाम पर आरक्षण देने की वकालत कर सकते थे।


बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में आरक्षण जोड़ा इसलिए कि जो पिछड़े लोग हैं और पिछड़े लोग वो जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। उन्हें सबकी तरह एक समान स्तर तक लाया जा सके और उन्हें समाज मे बराबरी पर लाने के लिए आर्थिक रूप से आरक्षण के रूप में सहायता मिले। किन्तु हुआ ऐसा नही।

आरक्षण को जातिगत फायदे के लिए और वोटों के लिए बांट दिया गया। एकसमान देश के एक जैसे लोग बँट गए जाती और धर्म में।कोई अल्पसंख्यक आरक्षण में आ गए तो कोई अनुसूचित जाति तो कोई अनुसूचित जनजाति के रूप में समाज मे बँट गए। सब एक समान हैं वाला नारा जाती और धर्मो में बंट गया।
आज आरक्षण को जाती और धर्म के आधार पर दिया जाना किसी भी आधार पर उचित नही ठहराया जा सकता है। हम सब मिलकर एक समृद्ध और विशाल भारत बनाने का सपना देखते हैं और उस सपने को साकार करने के लिए होनहार लोगो की आवश्यकता होगी परन्तु आरक्षण नाम का कीड़ा उन होनहारों के रास्ते मे दीवार बनकर बैठा है। इस बात को इस तरह समझते हैं कि किसी गरीब सामान्य वर्ग के परिवार का कोई होनहार बालक किसी प्रतिस्पर्धा में 80 प्रतिशत अंक प्राप्त करता है  और उसकी प्रतिभाग करने की शुल्क 500 रुपये तक होती है। किंतु उसको नही चुना जाता है। परंतु किसी तथाकथित जातिगत या विशेष समुदाय के संपन्न परिवार के बालक को 60 प्रतिशत लाने पर भी उस प्रतिस्पर्धा में चुन लिया जाता है और उसकी प्रतिस्पर्धा में भाग लेने का शुल्क 250 रुपये मात्र होता है।



अब जो बालक सिर्फ इसलिए नही चुना जाता है कि वो सामान्य वर्ग से है उसने मेहनत भी ज्यादा की है  शुल्क भुगतान भी  ज्यादा किया है अंक भी अधिक प्राप्त किये हैं तब सोचिये उसकी पूर्ण मेहनत करने के बाद भी असफलता हासिल होने पर उसकी मनोदशा उसे किस दिशा में ले जाएगी। इसी तरह हम कई होनहार प्रतिभाओं को खो देते हैं।
सिर्फ जातिगत और समुदायिक आरक्षण के आधार पर हम एक होनहार प्रतिभा को नही चुन पाते हैं। जबकि आर्थिक आधार पर वो उन आरक्षित लोगो से बहुत पीछे है जो तथाकथित रूप से पिछड़े हुए हैं।
मैं ये नही कहता हूं कि आरक्षण नही देना चाहिए बस ये कहना चाहता हूं की आरक्षण जाति या समुदाय को नही उन लोगो को दिया जाना चाहिए जो वाकई इसके हकदार हैं। जो आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं उन्हें उबारने के लिए आरक्षण होना चाहिए। एक देश मे सब एक समान हैं तो किसी जाति और समुदाय के लिए आरक्षण कैसे हो सकता है। उस समय जब आरक्षण को संविधान में शामिल किया गया हो सकता है उस वक़्त के हिसाब से वो सही रहा हो किन्तु  आज के वक्त में इसे किसी भी स्तर पर सही नही कह सकते हैं हमे आरक्षण नीति को वक़्त की मांग के साथ बदलना होगा और इसे जातिय और समुदायिकता से उखाड़ फ़ेंककर गरीब और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो की सही पहचान कर उन्हें मुहैया कराना होगा।
आरक्षण का प्रयोग सही तरीके से और सही लोगों के उपयोग में लाना होगा। इससे जो सम्पन्न लोग हैं और आरक्षण ( जातीय या सामुदायिक आरक्षण) का फायदा पीढ़ी दर पीढ़ी सम्पन्न होने के बाद भी उठा रहे हैं उनसे हटाकर गरीब और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो को देने से देश की दिशा और दशा दोनों में सुधार होगा। बाबा साहेब अम्बेडकर के सपने ( सब समान हों ) को साकार करना है तो जातिगत और समुदायिक आरक्षण को बदलकर आर्थिक आरक्षण की नीति में लाना होगा। एक दूरदृष्टि और सही निर्णय की सख्त आवश्यकता है अगर हम ये करने में साकार हो जाते हैं तो भारत को आगे बढ़ने या बल्कि यूँ कहें कि विश्वगुरु बनने की दिशा में बढ़ने से कोई नही रोक सकता है।
राज बिष्ट।

Thursday, November 17, 2022

पलेठी सूर्य मंदिर की किसी को सुध नहीं ख़त्म हो रही है महान विरासत



सूर्य मंदिर का नाम सुनते ही हमारे सामने कोणार्क के सूर्य मंदिर की छवि बन जाती है, पर ऐसे ही दो सूर्य मंदिर और हैं जिनमे से एक कटारमल अल्मोड़ा में स्तिथ है तथा दूसरा पलेठी टिहरी गढ़वाल में।और मैं जिस सूर्य मंदिर के बारे में लिख रहा हूँ वो है टिहरी गढ़वाल की देवप्रयाग तहसील के ब्लॉक हिंडोलाखाल से 10 किलोमीटर की दूरी पर पलेठी गांव में स्तिथ ।



यह एक प्राचीन सूर्य मंदिर। मान्यता अनुसार 7वीं-8 वीं शताब्दी की प्राचीन अवधि से संबंधित गढ़वाल में हिंडोलाखाल से 10 किमी दूर यह सूर्य मंदिर, लुलेरा गुलेरा घाटी में स्थित हैं। अगर हम स्थानीय लोगों पर विश्वास करते हैं, तो ग्रामीणों द्वारा खुदाई में मंदिरों का एक समूह मिला था। जिनमे एक यह सूर्य मंदिर तथा एक शिव मंदिर प्राप्त हुए थे। भारत मे कोणार्क और कटारमल के अलावा तीसरा सूर्य मंदिर यंही स्तिथ है। इस सूर्य मंदिर के पत्थरों पर कौन सी लिपि में लिखा गया है ये आज भी एक चर्चा और खोज का विषय है। कुछ पत्थरों पर पाया गया है कि इनपर ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है पर कुछ पर अभी स्तिथि स्पष्ट नही है भारतीय पुरातत्व विभाग के डॉ एसएन घई और डॉ के.वी. रमेश, ने 22 अक्टूबर 1968 को मंदिर के शिलालेखों का अध्ययन किया। महाराजाधिरराज परमेश्वर कल्याण वर्मन का नाम ब्रह्मी में संरचना पर एक प्रमुख उल्लेख पाया गया है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, सूर्य मंदिर 7वीं -8वीं शताब्दी के दौरान बनाए गए थे जब यह क्षेत्र ब्रह्मपुर के वरमानों के शासनकाल में था। अपने आप मे कई अनोखे राज समेटे यह सूर्य मंदिर पर्यटन और आध्यात्मिक दृष्टि से कई बड़ी संभावनाएं समेटे हुए है। इस मंदिर का डिजाइन अपने आप मे अलग और दुर्लभ है। आद्यात्मिकता और पर्यटन को साथ संजोने की दृष्टि से ये भारत की कुछ चुनिन्दा जगहों में से एक है।





पलेठी में सूर्य मंदिर इस अर्थ में विशेष हैं कि ये दक्षिण भारतीय परंपरा से अलग है। इस सूर्य मंदिर के पास में एक और मंदिर स्तिथ है जो भगवान भोलेनाथ का मंदिर है जो श्री चमनेश्वर महादेव के नाम से विख्यात है। दोनों मंदिर संस्कृतिक विरासत को संभाले हुए है किंतु सरकार और सरकारी मशीनरी के ढीले रवैये के कारण ये आज जिस जर्जर स्तिथि में है उसे गांव ही नही अपितु पूरे क्षेत्र के लोगो मे निराशा की भावना है उचित रखरखाव की कमी के कारण यह सूर्य मंदिर विलुप्त होने के कगार पर है। प्राचीन संरचनाएं जिनमें पुरातात्विक महत्व है, वे उचित रखरखावों न होने के कारण बर्बाद हो रहे हैं। आज इस मंदिर के पास में सड़क पहुंच गई है जिससे यंहा पहुंचना बहुत आसान हो गया है और इसके पुनः जीर्णोद्धार के लिए ज्यादा मेहनत की भी जरूरत नही पड़ेगी पर कोई भी सरकार या जिला प्रशासन इसकी सुध नही लेता है। अगर प्रशासन और सरकार इसपर ध्यान देते हैं तो भविष्य में हमारी इस महान धरोहर को एक बडे पर्यटन क्षेत्र के रूप में देखा जा सकता है। बस जरूरत है एक पहल की।

#राजबिष्ट


Tuesday, November 15, 2022

हटाए गये विधानसभा कर्मचारियों की नहीं होगी बहाली

 विधानसभा के हटाए गए कर्मचारियों की बहाली नैनीताल हाईकोर्ट के ऑर्डर के बाद भी नहीं हो पाई है। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी ने कहा कि इन कर्मचारियों को लेकर विधिक राय ली जा रही है और उसके बाद ही इनके संदर्भ में निर्णय लिया जाएगा। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी ने 2016 के बाद विधानसभा में हुई भर्तियों को निरस्त करते हुए 250 कर्मचारियों को हटा दिया था।

कर्मचारी इस फैसले के खिलाफ कोर्ट गए तो नैनीताल हाईकोर्ट ने 15 अक्तूबर को स्पीकर के फैसले पर स्टे दे दिया। 



कर्मचारी वापस ज्वाइनिंग के लिए आए तो विधानसभा सचिवालय ने कर्मचारियों को रिसीविंग तो दी लेकिन उन्हें अग्रिम निर्देशों तक कार्यालय न आने को कह दिया।


आप अपनी राय जरूर दे



Sunday, November 13, 2022

हरचण लैगी भाषा निचन्त होण लैगी संस्कृति। (खोने लगी भाषा खत्म होने लगी संस्कृति)

  

हरचण लैगी भाषा निचन्त होण लैगी संस्कृति।

(खोने लगी भाषा खत्म होने लगी संस्कृति)

जी हाँ ये एक पंक्ति ही अपने आप मे सबकुछ कह जाती है। आज उत्तराखंड की विलुप्त होती गढ़वाली और कुमाउनी भाषा उत्तराखंड की संस्कृति को भी विलुप्ति की दिशा में ले जा रही हैं।

 किसी भी संस्कृती की पहचान वहां की भाषा, वहां की वेशभूषा होती है। गढ़वाली और कुमाउनी उत्तराखण्ड की प्रमुख बोली जाने वाली दो भाषाएँ हैं किंतु आज ये दोनों भाषाएँ विलुप्ति की दिशा में अग्रसर हैं। आज की इस भागती दौड़ती जिंदगी में रोजगार और शिक्षा के अलावा भी अन्य कई कारणों से उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन अपने चरम पर है, जिस कारण से लोगो को पहाड़ो से शहरों की तरफ भागना पड़ रहा है। लोग पहाड़ो से शहर में आकर वहीं बस जाते हैं और वहां की वेशभूषा वहां की भाषा को ही अपना लेते हैं और यहां तक कि उनके बच्चों को अपनी मूल भाषा का ज्ञान भी नही होता है। इसी कतार में कुछ लोग वो भी हैं जो दिखावटीपन के लिए भी अपनी मूल भाषा नही बोलते हैं। और कुछ लोगों को अपनी भाषा को बोलने में शर्म भी आती है। इसी तरह से गढ़वाली और कुमाउनी भाषा बोलने वालों की संख्या में हर साल कमी आ रही है और इस कमी के कारण उत्तराखण्ड की महान विरासत हमारी महान संस्कृति धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। 

पुराने वक़्त में कौथिक (थौल), सामूहिक नृत्य, सामूहिक गान इस तरह से कई अन्य आयोजन हमारी भाषा और संस्कृति को संजोकर रखते थे और लोगो के बीच मे प्रेमभाव बनाये रखने में बेजोड़ थे। किंतु आज दो गढ़वाली आपस मे गढ़वाली में और दो कुमाउनी आपस मे कुमाउनी में बात नही करते। दूसरी भाषाओं को बोलने की होड़ लगी हुई है । अपनी भाषा में बात करने में शर्म महशूश करते हैं। जबकि हमें अपनी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए।

हमारे अपने इस तरह के लोग हैं जो अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।

उनकी तुलना में कुछ लोग अभी ऐसे भी हैं जो आज भी देश या विदेशों में रहकर अपनी गढ़वाली या कुमाउनी भाषा को खुद भी बोलते हैं और अपने बच्चों को भी सिखाते हैं। यहां तक वो अपनी संस्कृति को अपने और अपने बच्चों के माध्यम से पूरे देश ही नही विदेश में भी प्रचार करते हैं।कई लोग इस दिशा में कार्य कर रहे हैं।

मेरा यह लेख किसी भी भाषा के खिलाफ नही है किंतु मैं ये कहना चाहता हूं कि आप अपने बच्चों को सब तरीके की भाषा सिखाऐं किन्तु अपनी गढवाली या कुमाउनी भाषा को सीखाना बिल्कुल न भूलें। अपनी भाषा को बचाये रखें अपनी संस्कृति बची रहेगी।

हो सके तो अपने गावों में कुछ पारम्परिक रीति रिवाजों को फिर साथ मिलकर सामूहिक रूप से मनाएं। अपनी भाषा अपनी संस्कृति के मेल मिलाप को संजोकर रखें।

क्योंकिं इतिहास गवाह है जिनकी भाषा खोई संस्कृति खोई उनका फिर नामो निशान भी मिट गया।

आप जहां भी रहें किन्तु अपनी गढवाली और कुमाउनी भाषा के साथ - साथ अपनी संस्कृति को बनाये रखें बचाये रखें। अपनी मातृभाषा को बोलने में न हिचकें और न शर्म करें। अपनी भाषा अपनी संस्कृति पर गर्व करें। आज के इस आधुनिक युग मे हमे टेक्नोलॉजी और अपनी सांस्कृतिक धरोहर अपनी भाषा को साथ लेकर चलना होगा ।

त आवा अपणी भाषा अपणी संस्कृति तैं बाचौण का खातिर आज संकल्प करदा कि अपणी भाषा बोलला और अपणी संस्कृति तै दुनिया मा फैलोला।

(तो आओ आज अपनी भाषा और संस्कृति बचाने के लिए आज संकल्प करते हैं कि अपनी भाषा बोलेंगे और अपनी अपनी संस्कृति को दुनिया तक फैलाएंगे)

#राज बिष्ट


जब रावण को मंदोदरी ने कहा राम का अवतार धारण कर लो।

 रावण सीता को समझा समझा कर

हार

गया था पर

सीता ने रावण की तरफ

एक बार देखा तक नहीं, तब

मंदोदरी ने

उपाय बताया कि तुम राम बन के

सीता के

पास जाओ वो तुम्हे जरूर देखेगी।



रावण ने कहा - मैं ऐसा कई बार कर

चुका हू

मंदोदरी - तब क्या सीता ने

आपकी ओर देखा

रावण - "मैं खुद सीता को नहीं देख

सका...क्योंकि मैं जब-जब राम बनता हूँ

मुझे

परायी नारी

अपनी माता और

अपनी पुत्री सी दिखती है

----।"

अपने अंदर राम को ढूंढे,

और उनके चरित्र पर चलिए ।

आपसे भूलकर भी

भूल नहीं होगी ।।

Friday, August 5, 2022

क्या यही है सपनो का भारत

 भारत सदियों से एक ऐसा देश रहा हैं जहाँ हर प्रकार के लोगो को समाहित करने का माद्दा है



भारत ने न कभी किसी देश पर इस उद्देश्य से आक्रमण किया की उसकी जमीन पर कब्ज़ा किया जाए और न कभी इस उद्देश्य से की किसी देश को आगे बढ़ने से रोका जाए भारत ने हमेशा से ही वसुधैव कुटुंबकम की अपनी नीति को अपनाया है और हमेशा ही उसपर कायम रहा है इतिहस गवाह है की जिसने भी यहाँ आकर यहाँ के रीति रिवाजो और यहाँ की संस्कृति को मिटाना चाहा या तो वो खुद मिट गया या फिर यहीं की संस्कृति में रम गया

भारत एक समागम का देश है जो ठीक उस फूलों के गुच्छे की तरह है जो कई तरह के फूलों को खुद में  समाये हुए है 

अपनी भिन्नताओ और अनेकता में एकता के लिए ही भारत को जाना जाता है 

 पर आज ऐसा दौर आ गया है जब हमने अपने सब नैतिक मूल्यों को खो दिया है हम इतने स्वार्थी हो गए हैं की जो हमारे स्वार्थ का कार्य न हो उसे करने के लिए हजार बार सोचते हैं चाहे वो कार्य कितना ही देशहित में  महत्वपूर्ण और आवशयक  क्यों न हो 

स्वच्छता  और समानता  का जो भाव हमारे  दिलो में होता था वो कहीं खो सा गया है एक दूसरे से निस्वार्थ मिलने की भावना कहीं बिखर के रह गयी है 

आज हम अपने आजादी के महान शहीदों को  सिर्फ स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर याद करते हैं उनकी कुर्बानियों  को भूल गये हैं 

हमने अपने सभी नैतिक मूल्यों का त्याग कर दिया है 

भारत को विकसित और संपन्न सिर्फ आर्थिक रूप से बनाना ही नहीं बल्कि उसकी जो सामाजिक समरसता है उससे भी बरकार रखना है 

जब हम अपने नैतिक मूल्यों को सही से समझ पाएंगे तब जाके ही कहीं एक समृद्ध विकसित सपनो के भारत का निर्माण हो पायेगा 

आपके कुछ विचार हों तो  कमेंट में जरूर लिखें 

राज बिष्ट  

Tuesday, July 26, 2022

जब पिप्पलाद ने शनि देव को जला दिया था

जब पिप्पलाद ने शनि देव को जला दिया था 

श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं.. इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।


एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-



नारद - बालक तुम कौन हो ?


बालक - यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।


नारद - तुम्हारे जनक कौन हैं ?


बालक - यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।


तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि -


हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।


बालक - मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?


नारद - तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।


बालक - मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?


नारद - शनिदेव की महादशा।


इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।


नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी। 


ब्रह्मा जी से वर् मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनिदेव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।



शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-


1 - जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा.. जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।


2 - मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

 

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे। अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।


सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है। आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की, जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है.. 

Wednesday, July 6, 2022

अग्निपथ योजना I

 अग्निपथ योजना क्या है,,,

1:- उम्र 17 वर्ष 6 माह से 21 वर्ष

2:- योग्यता सीनियर सेकेंडरी

3:- पहले की तरह फिजिकल टेस्ट

4:- सेवा अवधि 4 वर्ष

5:- प्रशिक्षण अवधि 6 माह

6:- प्रथम वर्ष वेतन 30 हजार रुपये महीना जिसमें 9 हजार की कटौती होगी, मतलब 21 हजार प्रतिमाह मिलेंगे, 

द्वितीय वर्ष 33000 रुपये मिलेगे जिसमे 10000 रुपये प्रति माह कटौती होगी, 23 हजार प्रतिमाह मिलेंगे, 

तृतीय वर्ष 36000 हजार रुपये मिलेंगे, जिसमे 11000 कटौती होकर 25000 हजार रुपये प्रतिमाह मिलेंगे, 

चौथे वर्ष 40000 हजार रुपये प्रति माह मिलेंगे, जिसमे 12000 रुपये महीना कटेंगे, 28000 हजार रुपये प्रति माह मिलेंगे,


7:- 4 साल सेवा अवधि बार रिटायरमेंट पर सेवा निधि पैकेज बतोर 11 लाख 71 हजार रुपये मिलेंगे।


8:- 4 साल की सेवा अवधि उपरांत योग्यता मापदंडों के हिसाब से 25 % जवानों को स्थायी रूप से सेना में नियुक्ति दे दी जाएगी, बाकी 75 % जवानों को अग्निवीर कौशल प्रमाण पत्र दिया जाएगा, जिसके बेस पर प्राइवेट कम्पनियों में जॉब में प्राथमिकता मिलेगी, साथ ही खुद का व्यवसाय करने के लिए मिनिमम ब्याज दरों पर नॉन सिक्योर लोन दिलाया जाएगा।


9:-तीनों सेनाओं में प्रतिवर्ष 50000 हजार जवानो की भर्ती की जाएगी,!!


कुछ सेफ्टी डिपार्टमेंट को छोड़ दे तो, 22 , 23 वर्ष से तो बेरोजगार रोजगार के लिए अप्लाई करना शुरू करते है, जबकि अग्निपथ योजना में तो 18, 19 में  लगा बच्चा 22,23 में तो रिटायर ही हो जाएगा, मतलब बाद में वो अपने खर्चे पर अच्छी जॉब की तैयारी कर सकता है,बच्चे अक्सर 18, 20 ,22 की उम्र में ही गलत संगत में पड़कर भटक जाते है, जबकि इस उम्र में तो वो देश सेवा कर रहा होगा, फिजिकल फिट रहेगा, आर्थिक परेशानी नही होगी,

 भारत सरकार बहुत ही कारगर योजना लेकर आई है, ज्यादा से ज्यादा युवा फायदा उठाए,"!!

Monday, June 13, 2022

अजीनोमोटो: यह धीमा जहर है।

अजीनोमोटो::

सफेद रंग का चमकीला सा दिखने वाला मोनोसोडि़यम ग्लूटामेट यानी अजीनोमोटो, एक सोडियम साल्ट है। अगर आप चाइनीज़ डिश के दीवाने हैं तो यह आपको उसमें जरूर मिल जाएगा क्योंकि यह एक मसाले

के रूप में उनमें इस्तमाल किया जाता है। शायद ही आपको पता हो कि यह खाने का स्वाद बढ़ाने वाला मसाला वास्तव में जहर यह धीमा खाने का स्वाद नहीं बढ़ाता बल्कि हमारी स्वाद ग्रन्थियों के कार्य को दबा देता है जिससे हमें खाने के बुरे स्वाद का पता नहीं लगता। मूलतः इस का प्रयोग खाद्य की घटिया गुणवत्ता को छिपाने के लिए किया जाता है। यह सेहत के लिए भी बहुत खतरनाक होता है।
जान लें कि कैसे-
* सिर दर्द, पसीना आना और चक्कर आने जैसी खतरनाक बीमारी आपको अजीनोमोटो से हो सकती है। अगर आप इसके आदि हो चुके हैं और खाने में इसको बहुत प्रयोग करते हैं तो यह आपके दिमाग को भी नुकसान कर सकता है।



* इसको खाने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है। चेहरे की सूजन और त्वचा में खिंचावमहसूस होना इसके कुछ साइड इफेक्ट हो सकते हैं।
* इसका ज्यादा प्रयोग से धीरे धीरे सीने में दर्द, सांस लेने में दिक्कत और आलस भी पैदा कर सकता है। इससे सर्दी-जुखाम और थकान भी महसूस होती है। इसमें पाये जाने वाले एसिड सामग्रियों की वजह से यह पेट और गले में जलन भी पैदा कर सकता है।
* पेट के निचले भाग में दर्द, उल्टी आना और डायरिया इसके आम दुष्प्रभावों में से एक हैं।
* अजीनोमोटो आपके पैरों की मासपेशियों और घुटनों में दर्द पैदा कर सकता है। यह हड्डियों को कमज़ोर और शरीर द्वारा जितना भी कैल्शिम लिया गया हो, उसे कम कर देता है।
* उच्च रक्तचाप की समस्या से घिरे लोगों को यह बिल्कुल नहीं खाना चाहिए क्योंकि इससे अचानक ब्लड प्रेशर बढ़ और घट जाता है।
* व्यक्तियों को इससे माइग्रेन होने की समस्या भी हो सकती है। आपके सिर में दर्द पैदा हो रहा है तो उसे तुरंत ही खाना बंद कर दें।
* अजीनोमोटो की उत्पादन प्रक्रिया भी विवादास्पद है : कहा जाता है कि इसका उत्पादन जानवरों के शरीर से प्राप्त सामग्री से भी किया जा सकता है।


*अजीनोमोटो बच्चों के लिए बहुत हानिकारक है। इसके कारण स्कूल
जाने वाले ज्यादातर बच्चे सिरदर्द के शिकार हो रहे हैं। भोजन में एमएसजी का इस्तेमाल या प्रतिदिन एमएसजी युक्त जंकफूड और प्रोसेस्ड फूड का असर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है। कई शोधों में यह बात साबित हो चुकी है कि एमएसजी युक्त डाइट बच्चों में मोटापे की समस्या का एक कारण है। इसके अलावा यह बच्चों को भोजन के प्रति अंतिसंवेदनशील बना सकता है। मसलन, एमएसजी युक्त भोजन अधिक खाने के बाद हो सकता है कि बच्चे को किसी दूसरी डाइट से एलर्जी हो जाए। इसके अलावा, यह बच्चों के व्यवहार से संबंधित समस्याओं का भी एक कारण है। छिपा हो सकता है अजीनोमोटो अब पूरी दुनिया में मैगी नूडल बच्चे बड़े सभी चाव से खाते हैं, इस मैगी में जो राज की बात है वो है Hydrolyzed groundnut protein और स्वाद वर्धक 635 Disodium ribonucleotides यह कम्पनी यह दावा करती है कि इसमें अजीनोमोटो यानि MSG नहीं डाला गया है। जबकि Hydrolyzed groundnut protein पकने के बाद अजीनोमोटो यानि MSG में बदल जाता है और Disodium ribonucleotides इसमें मदद करता है।

#RajBisht

Wednesday, June 1, 2022

महाराजा विक्रमादित्य के नवरत्न

 अकबर के नौरत्नों से इतिहास भर दिया पर महाराजा विक्रमादित्य के नवरत्नों की कोई चर्चा पाठ्यपुस्तकों में नहीं है। जबकि सत्य यह है कि अकबर को महान सिद्ध करने के लिए महाराजा विक्रमादित्य की नकल करके कुछ धूर्तों ने इतिहास में लिख दिया कि अकबर के भी नौ रत्न थे ।

राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों को जानने का प्रयास करते हैं।

राजा विक्रमादित्य के दरबार में मौजूद नवरत्नों में उच्च कोटि के कवि, विद्वान, गायक और गणित के प्रकांड पंडित शामिल थे, जिनकी योग्यता का डंका देश-विदेश में बजता था। चलिए जानते हैं कौन थे।
ये हैं नवरत्न –
1–धन्वंतरि -


नवरत्नों में इनका स्थान गिनाया गया है। इनके रचित नौ ग्रंथ पाये जाते हैं। वे सभी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित हैं। चिकित्सा में ये बड़े सिद्धहस्त थे। आज भी किसी वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उसकी ‘धन्वन्तरि’ से उपमा दी जाती है।
2– क्षपणक


जैसा कि इनके नाम से प्रतीत होता है, ये बौद्ध संन्यासी थे।
इससे एक बात यह भी सिद्ध होती है कि प्राचीन काल में मन्त्रित्व आजीविका का साधन नहीं था अपितु जनकल्याण की भावना से मन्त्रिपरिषद का गठन किया जाता था। यही कारण है कि संन्यासी भी मन्त्रिमण्डल के सदस्य होते थे।
इन्होंने कुछ ग्रंथ लिखे जिनमें ‘भिक्षाटन’ और ‘नानार्थकोश’ ही उपलब्ध बताये जाते हैं।
3–अमरसिंह


ये प्रकाण्ड विद्वान थे। बोध-गया के वर्तमान बुद्ध-मन्दिर से प्राप्य एक शिलालेख के आधार पर इनको उस मन्दिर का निर्माता कहा जाता है। उनके अनेक ग्रन्थों में एक मात्र ‘अमरकोश’ ग्रन्थ ऐसा है कि उसके आधार पर उनका यश अखण्ड है। संस्कृतज्ञों में एक उक्ति चरितार्थ है जिसका अर्थ है ‘अष्टाध्यायी’ पण्डितों की माता है और ‘अमरकोश’ पण्डितों का पिता। अर्थात् यदि कोई इन दोनों ग्रंथों को पढ़ ले तो वह महान् पण्डित बन जाता है।
4–शंकु


इनका पूरा नाम ‘शङ्कुक’ है। इनका एक ही काव्य-ग्रन्थ ‘भुवनाभ्युदयम्’ बहुत प्रसिद्ध रहा है। किन्तु आज वह भी पुरातत्व का विषय बना हुआ है। इनको संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान् माना गया है।
5– वेतालभट्ट


विक्रम और वेताल की कहानी जगतप्रसिद्ध है। ‘वेताल पंचविंशति’ के रचयिता यही थे, किन्तु कहीं भी इनका नाम देखने सुनने को अब नहीं मिलता। ‘वेताल-पच्चीसी’ से ही यह सिद्ध होता है कि सम्राट विक्रम के वर्चस्व से वेतालभट्ट कितने प्रभावित थे। यही इनकी एक मात्र रचना उपलब्ध है।
6– घटखर्पर


जो संस्कृत जानते हैं वे समझ सकते हैं कि ‘घटखर्पर’ किसी व्यक्ति का नाम नहीं हो सकता। इनका भी वास्तविक नाम यह नहीं है। मान्यता है कि इनकी प्रतिज्ञा थी कि जो कवि अनुप्रास और यमक में इनको पराजित कर देगा उनके यहां वे फूटे घड़े से पानी भरेंगे। बस तब से ही इनका नाम ‘घटखर्पर’ प्रसिद्ध हो गया और वास्तविक नाम लुप्त हो गया।
इनकी रचना का नाम भी ‘घटखर्पर काव्यम्’ ही है। यमक और अनुप्रास का वह अनुपमेय ग्रन्थ है।
इनका एक अन्य ग्रन्थ ‘नीतिसार’ के नाम से भी प्राप्त होता है।
7– कालिदास


ऐसा माना जाता है कि कालिदास सम्राट विक्रमादित्य के प्राणप्रिय कवि थे। उन्होंने भी अपने ग्रन्थों में विक्रम के व्यक्तित्व का उज्जवल स्वरूप निरूपित किया है। कालिदास की कथा विचित्र है। कहा जाता है कि उनको देवी ‘काली’ की कृपा से विद्या प्राप्त हुई थी। इसीलिए इनका नाम ‘कालिदास’ पड़ गया। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कालीदास होना चाहिए था किन्तु अपवाद रूप में कालिदास की प्रतिभा को देखकर इसमें उसी प्रकार परिवर्तन नहीं किया गया जिस प्रकार कि ‘विश्वामित्र’ को उसी रूप में रखा गया।
जो हो, कालिदास की विद्वता और काव्य प्रतिभा के विषय में अब दो मत नहीं है। वे न केवल अपने समय के अप्रितम साहित्यकार थे अपितु आज तक भी कोई उन जैसा अप्रितम साहित्यकार उत्पन्न नहीं हुआ है। उनके चार काव्य और तीन नाटक प्रसिद्ध हैं। शकुन्तला उनकी अन्यतम कृति मानी जाती है।
8–वराहमिहिर

भारतीय ज्योतिष-शास्त्र इनसे गौरवास्पद हो गया है। इन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। इनमें-‘बृहज्जातक‘, सुर्यसिद्धांत, ‘बृहस्पति संहिता’, ‘पंचसिद्धान्ती’ मुख्य हैं। गणक तरंगिणी’, ‘लघु-जातक’, ‘समास संहिता’, ‘विवाह पटल’, ‘योग यात्रा’, आदि-आदि का भी इनके नाम से उल्लेख पाया जाता है।
9– वररुचि


कालिदास की भांति ही वररुचि भी अन्यतम काव्यकर्ताओं में गिने जाते हैं। ‘सदुक्तिकर्णामृत’, ‘सुभाषितावलि’ तथा ‘शार्ङ्धर संहिता’, इनकी रचनाओं में गिनी जाती हैं।
इनके नाम पर मतभेद है। क्योंकि इस नाम के तीन व्यक्ति हुए हैं उनमें से-
1.पाणिनीय व्याकरण के वार्तिककार-वररुचि कात्यायन,
2.‘प्राकृत प्रकाश के प्रणेता-वररुचि
3.सूक्ति ग्रन्थों में प्राप्त कवि-वररुचि
आपको पता है ऐसे नवरत्न अब क्यों नहीं पैदा होते क्योंकि वेदों के ऊपर रिसर्च नहीं होता धर्म ग्रंथों को पढ़ाया नहीं जाता और धर्म ग्रंथों के ज्ञान को सिर्फ एक समाज के फायदे से जोड़ दिया और धर्म ग्रंथ के ज्ञान को पूजा-पाठ तक ही सीमित रख दिया मगर आप सच्चाई जानते हैं हमारे धर्म ग्रंथों का ज्ञान किसी भी विज्ञान गणित साइंस से भी आगे है ऋषि परंपरा गुरुकुल की बहुत आवश्यकता है अकबर के नौरत्नों से इतिहास भर दिया पर महाराजा विक्रमादित्य के नवरत्नों की कोई चर्चा पाठ्यपुस्तकों में नहीं है। जबकि सत्य यह है कि अकबर को महान सिद्ध करने के लिए महाराजा विक्रमादित्य की नकल करके कुछ धूर्तों ने इतिहास में लिख दिया कि अकबर के भी नौ रत्न थे ।

Saturday, April 9, 2022

बुजुर्गों की देखभाल को बनाए समाज का आयना

 बुजुर्गों की देखभाल को बनाए समाज का आयना 

भारत सरकार के समाज कल्याण मंत्रालय के द्वारा ग्रामीण क्षेत्र विकास समिति देहरादून के माध्यम से

वृद्ध लोगों की देखभाल हेतू एक दिवसीय प्रशिक्षण युवा कल्याण निदेशालय मे चलाया गया।



इस अवसर पर कार्यक्रम का उद्धघाटन जिला युवा कल्याण अधिकारी प्रकाश चंद्र सती सेवा निवृत्त आर के पंत संस्था अध्यक्ष सुशील बहुगुणा ने किया। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि

बुज्रगों को भी बच्चे की तरह देखभाल की आवश्यकता है।



 कहा गया भारत में, लगभग 120 मिलियन बुजुर्ग लोग विभिन्न शारीरिक, मनोसामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक समस्याओं से पीड़ित हैं।  जबकि कार्यात्मक और संज्ञानात्मक रूप से फिट बुजुर्ग सामान्य स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं तक पहुंच सकते हैं, इन लोगों को स्वतंत्र रखने के लिए सक्रिय उम्र बढ़ने के कार्यक्रम की आवश्यकता होती है।  यहीं पर जराचिकित्सा देखभाल काम आती है।




इस प्रशिक्षण मे जेरियाट्रिक्स या जेरियाट्रिक मेडिसिन एक विशेषता है जो बुजुर्ग लोगों के लिए स्वास्थ्य देखभाल में सुधार पर आधारित है।  यह अक्सर उम्र बढ़ने के साथ आने वाली बीमारी और विकलांगता को रोकने और उसका इलाज करके वृद्ध वयस्कों में स्वस्थ सुधार का समर्थन करता है।  वृद्धावस्था नर्सिंग वृद्ध वयस्कों को उनके घर, अस्पताल या विशेष संस्थानों जैसे नर्सिंग होम, मनोरोग संस्थान आदि में खानपान सहायता शामिल है

कार्यक्रम मे  सुशील डोभाल, राजेन्द्र fc’V vkSj  सौरभ cMksuh वृद्धा अवस्था से जुड़े कार्यकर्ता उपस्थित Fks


#राज बिष्ट 

Saturday, December 4, 2021

चमत्कारी संत श्री नीम करोली।

चमत्कारी संत श्री नीम करोली जी महाराज जी.

 भारतभूमि कई सिद्ध आत्माओं की जन्मभूमि रही है. इसे ऋषि मुनियों की कर्म भूमि होने का सौभाग्य प्राप्त रहा है. ऐसे ही एक महान संत हुए बाबा नीब करौरी महाराज जी, जिनकी दिव्यता के मुरीद भारतभूमि से लेकर पूरे विश्व के जनमानस रहे. एप्पल कंपनी के संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग, बाबा नीब करौरी महाराज को अपनी आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बताते हुए आए हैं.

नीब करौरी महाराज जी को उनके भक्त महाराज जी के नाम से संबोधित करते हैं. महाराज जी का जन्म सन 1900 में अकबरपुर गांव, फ़िरोज़ाबाद ज़िला, उत्तरप्रदेश  के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिताजी का नाम दुर्गा प्रसाद शर्मा था.परिवार वालों ने महाराज जी का नाम लक्ष्मण दास शर्मा रखा था.


ग्यारह वर्ष की आयु में बालक लक्ष्मण दास का विवाह करा दिया गया. लेकिन उनका मन गृहस्थ जीवन में नहीं लगा और उन्होंने गृह त्याग दिया. कुछ वक़्त साधु की तरह भटकने के बाद, पिता दुर्गा प्रसाद शर्मा की विनती पर लक्ष्मण दास घर लौट आए और सांसारिक जीवन जीने लगे.


मगर नियति में आध्यात्मिक संसार और जीवन लिखा था. सन 1958 में महाराज जी ने सांसारिक जीवन त्याग दिया.उन्होंने पूरे उत्तर भारत की यात्रा की। यहां एक रोचक प्रसंग मिलता है. जब महाराज जी अपने गांव से उत्तर भारत की यात्रा पर निकले तो टिकट कलेक्टर ने उन्हें फर्रुखाबाद जनपद के गांव नीब करौरी के निकट ट्रेन से उतार दिया. महाराज जी के पास ट्रेन का टिकट नहीं था। महाराज जी उतर गए. मगर फिर ट्रेन नहीं चल सकी. यात्रियों ने टीसी से कहा कि यह एक महान संत हैं और इनकी आज्ञा के बिना अब यह ट्रेन नहीं चलने वाली. टीसी ने तब महाराज जी से क्षमा याचना की और ट्रेन को चलने की आज्ञा देने की विनती की. इस पर महाराज जी ने दो शर्त रखी. पहली यह कि नीब करौरी को एक रेलवे स्टेशन घोषित किया जाए.और आगे से साधु महात्माओं से अच्छी तरह से पेश आया जाए. रेलवे अधिकारियों ने दोनों शर्त मान ली और फिर ट्रेन चल पड़ी. 



अपनी यात्राओं के दौरान महाराज जी अलग अलग स्थानों पर रुकते. उनके अलग अलग नाम रखे गए. भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार उनको पुकारता.महाराज जी प्रभु श्री राम और हनुमान जी की भक्ति करते थे. अपने भक्तो को हनुमान चालीसा पढ़ने की सलाह देते थे.गुजरात में तपस्या करने के बाद महाराज जी ने अपने दो आश्रम स्थापित किए. फर्रुखाबाद और कैंची में.यह दोनों आश्रम विदेशियों के आकर्षण का केंद्र बने.हिप्पी आंदोलन के दौरान जो विदेशी भारत भूमि अाए, वह महाराज जी के संपर्क में आने पर उनके अनन्य भक्त बन गए.राम दास, कृष्ण दास उनके विदेशी भक्तो के नाम थे, जिनका नामकरण महाराज जी ने स्वयं किया. 


महाराज जी ने सन 1964 में कैंची, उत्तराखंड में अपने आध्यात्मिक धाम की स्थापना की. अपने जीवन के अंतिम दस वर्ष महाराज जी कैंची धाम में रहे.कैंची धाम विश्व विख्यात स्थल है. यहां हर वर्ष 15 जून को विशाल भंडारा होता है, जहां एक दिन में तक़रीबन एक साल से अधिक लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं.


महाराज जी की कुछ बहुत साफ़, सीधी, सटीक बातें थीं. सभी से प्रेम करो, ईश्वर का स्मरण करो, भूखों को भोजन कराओ, सभी के साथ सेवा भाव रखो.


11 सितंबर 1973 को वृंदावन के एक अस्पताल में महाराज जी ने अपने भौतिक शरीर का त्याग कर दिया. वृंदावन में ही उनका समाधि स्थल है. आज महाराज जी के करोड़ों भक्त पूरी दुनिया में सेवा और प्रेम का संदेश दे रहे हैं. यही सच्ची प्रार्थना है.


#राज बिष्ट

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